यदा-कदा

गल्प

भूमिका

बायोडाटा

इनुमुला सत्यनारायण को आईआईटी (आईएसएम) धनबाद से डॉक्टरेट की उपाधि मिली

आकाश में कोरोना घना है..

दिनेश कुमार माली की मौलिक एवं अनूदित रचनाएँ :-

स्काई ट्रेफिक जाम

एटोपोटाटो

कोरोना काल में नचिकेता

अदृश्य विषाणुओं के घेरे में

महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड के प्रथम पुरुष श्री अनिमेष नन्दन सहाय और प्रथम महिला श्रीमती अंजु सहाय

महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड के निदेशक(संचालन) श्री जसविंदर पाल सिंह और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती परमजीत कौर

अंतरराष्ट्री संगोष्ठी (ऑनलाइन)

सीता मिथक में नारी-पारिस्थितिकवाद

प्रशस्ति पत्र

अनुवादक का अवसान

रोशनी आधी अधूरी सी

पूर्व और पश्चिम का सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण

राधामोहन गड़नायक के काव्य में आत्म-अभिव्यक्ति

डॉ. प्रसन्न कुमार बराल की डॉ. सुधीर सक्सेना से सीधी बातचीत

ययाति नगर में एक दिन

‘मैंने जो जिया’ : उद्भ्रांत से संभ्रांत की ओर ले जाने वाली आत्मकथा

‘शहर-दर-शहर उमड़ती है नदी’ : छह दशकों की साहित्यिक स्मृतियाँ

गोलापमंजरी कर की कहानी "मिथुन लग्न"

नन्दिता मोहंती की कहानी ' दाम्पत्य'

सरोजिनी साहू की कहानी 'जीवन-ज्यामिति'

डॉ॰ प्रसन्न कुमार बराल की कहानी " घने कोहरे की माया"

“अभिनव पांडव”: नए मनुष्य की खोज

पांडिचेरी में इस सदी के महान कहानीकार श्री मनोज दास से दिनेश कुमार माली की भेंट-वार्ता

श्री प्रकाश चन्द्र पारख,पूर्व सचिव,कोयला मंत्रालय,भारत सरकार की पुस्तक “कोल-कोनन्ड्रम:द एग्जीक्यूटिव फेलियर एंड ज्यूडिशियल एरोगेन्स” की समीक्षा

दिनेश कुमार माली की कहानी "धूमिल दिशा"

दिनेश कुमार माली की कहानी "जेयु"

नन्दिता मोहंती की कहानी "दाग"

नन्दिता मोहंती की कहानी सुसाइड

संजीवनी भेलान्दे की पुस्तक “मीरा एंड मी” में ‘मीरा-तत्व’ की विवेचना

भूमिका

Published On 17-11-2021

भूमिका

प्रोफेसर आनंद कुमार सिंह द्वारा रचित “अथर्वा (मैं वही वन हूँ)” एक अद्भुत वृहद ग्रंथ है, जिसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ‘महाकाव्य’, ‘महाकविता, ‘काव्योपन्यास’या ‘काव्य-नाटक’ में किस श्रेणी में गिना जाए– इस विषय को लेकर आधिकारिक विद्वान आलोचकवर्ग भी असमंजस की स्थिति में है।
सूर्यनाथ सिंह इसे ‘महाकाव्य’ कई चरणों में खेला जाने वाला नाटक मानते हैं, जबकि प्रो. टी. आर. भट्ट इसे विशिष्ट ‘स्मृति काव्य’ की संज्ञा देते हैं। प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित की नजरों में यह कामायनी शृंखला की अगली कड़ी है तो विनोदशाही इसे ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ से प्रेरित मानते हैं। प्रो. सत्यकेतु हिन्दी कविता का नये युग में प्रवेश मानते हैं, प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी को इस कृति में महाकाव्य, नाटक, आख्यान, मुक्तक सभी काव्य-विधाओं का रसास्वादन एक साथ होता है। पांडेय शशिभूषण ‘शीतांशु’ के अनुसार यह परंपरा, संस्कृति और भारतीयता के त्रिक का स्वरूपात्मक-अनुसंधानात्मक महाकाव्य है, जबकि नित्यानंद तिवारी चैतन्य शक्ति की विलक्षण रचना मानते है। इस कृति में एक साथ इतनी विधाएं क्यों? मेरे सामने भी यह सवाल है। इस बारे में कवि स्वयं एक जगह लिखते हैं, “दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर के ठीक बाद आगम साहित्य के अध्ययन-मनन में वर्षों तक डूबे रहने से हुए जीवन दृष्टि में परिवर्तन और सन् 1992 में उज्जैन प्रवास के दौरान साधनागम्य अनुभवों के प्रकाश में नयी चेतना से हुए साक्षात्कार का परिणाम है यह कृति।”
कवि इसे महाकाव्य, नाटक, आख्यान, मुक्तक, स्मृति-काव्य, आत्मकथा, कुछ नहीं कहकर – आत्म-संघर्ष की महाकविता कहना पसंद करते है।
‘अथर्वा’ से जुड़ी मेरी स्मृतियाँ कुछ अलग तरह की हैं, भले ही, यह दूसरों के लिए साहित्यिक कृति हो सकती है, मगर मेरे लिए तो यह साक्षात् जीवनदायिनी प्राणवायु से कम नहीं है। इस ग्रंथ ने मेरे भीतर आलौकिक जैविक उर्जा का संचार किया, वह भी उस समय, जब मैं स्वयं हैदराबाद की यशोदा हास्पिटल में रक्त-कैंसर की जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था। भीतर ही भीतर मुझे अहसास हो रहा था कि मैं प्रतिक्षण मौत के बहुत करीब जा रहा हूँ। उस समय यह महाकाव्य मेरे भीतर बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने के साथ-साथ अपूर्व जीवन-शक्ति का विकास कर रही थी। मेरे रक्त की श्वेत कणिकाओं की संख्या लगातार कम से कमतर होती जा रही थी और मुझे लग रहा था कि शायद मेरे पास इस कृति को पढ़ने का अंतिम अवसर ही बचा है- यह सोचकर मैं उन क्षणों को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था। उस समय प्रोफेसर आनंद की दीर्घ तपस्या के कारण पवित्र आत्मा से निःसृत कविताओं की एक-एक पंक्ति मेरे लिए जिजीविषा की ईश्वर कणिका बनकर मेरे सामने सुरसा की तरह मुँह फाड़े खड़ी मौत से निर्ममतापूर्वक लड़ रही थी।
इस पुस्तक के अध्ययन से मैं मौत की नजदीक आती परछाई को भूलकर शून्य में गोते लगाने लगा। मेरे मन में स्वत: सकारात्मक भाव जागने लगे थे। बीमारी के उन तीन महीनों के दौरान ‘अथर्वा’के कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्पर्श करते हुए मेरी शंकाओं के निवारणार्थ मैंने कवि के सम्मुख सौ सवालों की झड़ी लगा दी थी। ये प्रश्न वैसे ही थे, जैसे कभी नचिकेता ने यम से पूछे थे, यक्ष ने पांडवों से किए थे और अर्जुन ने कृष्ण से।
एक सुधी-सजग पाठकीय दृष्टिकोण से मैंने उनकी इस कृति में लिपिबद्ध कहानियों और कविताओं का गहन अध्ययन किया तो पहली दृष्टि में ही मुझे लगा कि कवि केवल यश-कीर्ति के लिए कविताओं की रचना नहीं कर रहे हैं, वह अपनी आत्म-शुद्धि के साथ-साथ परम सत्ता तक पहुँचने के लिए अपने विचारों को त्वरित गति दे रहे है। यह सत्य है बिना ईश्वरीय अनुकंपा के ‘अथर्वा’ जैसी विशिष्ट कृति का निर्माण संभव नहीं है। पहले-पहल, मुझे लगा कि कवि एक परिपक्व साधक की तरह अमूर्त रूप से अपनी कविताएं साध रहा है। दूसरा, कवि की लेखनी की प्रांजलता, सुकोमल शब्दावली, कल्पना-शक्ति की सूक्ष्म-उड़ान और उदात्त दर्शन-शैली उनके विश्व साहित्य के गहन शोधपूर्वक अध्ययन की ओर इंगित करती है।
व्हाट्स अप्प के माध्यम से कवि को मैं अनवरत अपनी जिज्ञासाओं से सीधे अवगत करा रहा था, उसी दौरान उन्होंने मेरा परिचय वर्चुअल माध्यम से अपने घनिष्ठ मित्र, शासकीय माधव महाविद्यालय, उज्जैन में कार्यरत अंग्रेजी के सह-अध्यापक डॉ. लक्ष्मण सिंह गोरास्या से करवाया, जो उस समय उनकी ‘अथर्वा’ पर अढ़ाई सौ पृष्ठों की आलोचनात्मक पुस्तक लिख रहे थे, यह वही पुस्तक है,जिस पर मैं यह भूमिका लिखने जा रहा हूँ। यही नहीं, उन्होंने इस पुस्तक में दी गई अपनी आभारोक्ति में यह भी बताया कि डॉ. गोरास्या उनकी कुछ प्रारंभिक कविताओं के न केवल श्रोता थे, बल्कि ‘अथर्वा’ की रचना-प्रक्रिया के साक्षी थे। दोनों मित्रों के सुसनेर में अध्यापन के दौरान वाद-विवाद-संवाद की दीर्घ शृंखला इस कृति की रूपरेखा तैयार कर रही थी।जिसमें प्रोफेसर आनंद ने अपने आपको ऋषि कवि अथर्वा की भूमिका तथा अपने जिज्ञासु मित्र को उद्भ्रांत दीर्घतमा के रूप में स्थापित कर साहित्यिक जगत में आत्म-क्रांति का आह्वान कर अमरत्व प्रदान किया। इससे बड़ी सच्ची मित्रता का और क्या प्रमाण मिल सकता है!
ऐसे भी पहले से ही प्रोफेसर आनंद की ‘अथर्वा’ ने मुझे बेहद प्रभावित किया था, मगर प्रोफेसर गोरास्या की अद्यतन आलोचना-कृति ‘अथर्वा : एक महाक्रांति’ पढ़ने के बाद मेरे मन में दोनों कवि और आलोचक के प्रति अटूट श्रद्धा के भाव जाग गए। प्रोफेसर आनंद की तंत्र-साधना की झलक उनकी लेखनी पर साफ नजर आ रही थी तो उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सत्य के अनुसंधान में रत प्रोफेसर गोरास्या की कृति में श्री अरविंद की इस सदी की महान कालजयी कृति ‘सावित्री’ की अमिट छाप।अपनी मार्क्सवादी विचारधारा से अलग होकर आध्यत्मिकता की ओर रूख करने वाले डॉ. गोरास्या ‘सावित्री’ पर पीएचडी हेतु प्रेरित करने का श्रेय अपने मार्गदर्शक मित्र प्रोफेसर आनंद को देते हैं। मेरी दृष्टि में ‘अथर्वा’ आध्यात्मिक चेतना के स्फुलिंगों का ग्रंथ अवश्य है, मगर साथ ही साथ, मानव से अतिमानव की ओर अग्रसर करने वाली दो मित्रों की पारस्परिक अंतरंग वार्ता की अनुकरणीय पहल है और चेतना के उच्च स्तरों की यात्रा भी है।
‘अथर्वा’ की विशेषता यह है कि एक अंग्रेजी का आचार्य हिन्दी भाषा में लेखन हेतु प्रेरित होता है। मेरा यह मानना है कि कविता उसी भाषा में लिखी जाती है, जिस भाषा में कवि सपने देखता है, वैसे उदात्त आध्यात्मिक कृतियों का लेखन भी स्वपनदर्शी भाषा में होना चाहिए। ‘अथर्वा’के प्रभाव-वलय में केवल प्रोफेसर गोरास्या ही आए हुए हैं - ऐसी बात नहीं है। इस पुस्तक ने मेरे मन की भी अथाह गहराइयों को स्पर्श किया है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि उनकी जादुई यथार्थवाद से प्रेरित कहानियों ने मुझे उसी शैली में उपन्यास लिखने हेतु प्रेरित किया। ओड़िशा में सन् 1850 में अवतरित निराकारवादी संत कवि भीम भोई की आत्मकथा की परिकल्पना का जन्म यहीं से शुरू होता है।
‘अथर्वा’ के मुझ पर दो ऐसे ऋण है, जिससे कभी उऋण नहीं हो सकता हूँ। पहला, प्राणघातक रक्त कैंसर से संघर्ष के दौरान अंतरात्मा में जिजीविषा के जीवाणु पैदा करने में सहयोगी होना; दूसरा, ‘अथर्वा’ की उदात्त-प्रांजल भाषा शैली ने मेरे मन की कल्पना- शक्ति की उड़ान को नई गति दी, जिससे मैं अपना पहला उपन्यास पूरा कर सका। मैं ‘अथर्वा’ महाकाव्य को उच्च श्रेणी के वैश्विक साहित्य की श्रेणी में गिनता हूँ। पढ़ते समय पूरा विश्व चित्रपट की तरह आँखों के सामने घूमने लगता है।
इस महाकाव्य में न केवल वेदों, उपनिषदों, पुराणों, बौद्धग्रंथों, श्री अरविंद की ‘सावित्री’, ‘लाइफ डिवाइन’ आदि की अनुगूँज सुनाई देती है, बल्कि टी.एस. इलियट के काव्य नाटक ‘मर्डर एट कैथेड्रल’ तथा उनकी दीर्घ कविता ‘वेस्ट लैंड’, जॉन मिल्टन के ‘पेराडाइज लॉस्ट’, जेम्स जॉयस के उपन्यास ‘ए पोट्रेट ऑफ द आर्टिस्ट एज ए यंग मैन’, सैमुअल कॉलरिज की ‘बायोग्राफिका लिटरेरा’ आदि की उपस्थिति यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देती है। कवि आनंद ने खुद स्वीकार किया है कि उनकी कृति ‘अथर्वा’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘अनामदास का पोथा, जेम्स रेडफील्ड के उपन्यास ‘सेलेशियल प्रोफेसी, अम्बार्ता इको की रचना ‘द नेम ऑफ द रोज’ और खलील जिब्रान की प्रसिद्ध कृति ‘द प्रोफेट’ का प्रभाव है। भाषा और शिल्प के दृष्टिकोण से कवि ने कहीं-कहीं फैंटसी का सहारा लिया है तो कहीं-कहीं ऐतिहासिक दृष्टि को भी सूक्ष्मता से अन्वेषित किया है।काव्य-पृष्ठभूमि में बार-बार पर्दा बदलता रहता है, कभी धर्म, कभी अध्यात्म, कभी रहस्यानुभव तो कभी प्रेम की अनुभूतियाँ। कवि ने अपनी पूर्व पीढ़ी को भी इस रचना में बड़े आदर के साथ याद किया है। उनके व्यवहृत प्रसिद्ध शब्दों का प्रयोग कर उनके प्रति सम्मान जताया है। उदाहरण के तौर पर सच्चिदवेदना (मुक्तिबोध), तंत्रालोक (अभिनव गुप्त), मायादर्श (श्री कांत वर्मा), अतिमानस (अरविंद), प्रति नारायण (कुबेर नाथ राय) जैसे शब्द इस कृति में सहजता से देखने को मिल जाएंगें। जय शंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’,सुमित्रानंदन पंत, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’, नरेश मेहता, रामाधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे प्रमुख हिंदी कवियों की शब्दावली की नींव पर ‘अथर्वा’ की अट्टालिका तैयार हुई है। इस ग्रंथ में केवल कविताएँ ही नहीं हैं, बल्कि अत्यंत ही उच्च कोटि की कहानियाँ भी शामिल है। कविताओं के साथ-साथ कहानियों का जन्म कैसे हुआ? साधक कवि के मन में अचानक कहानीकार का उदय ! कहानियाँ भी एक-दो नहीं, बल्कि पंद्रह कहानियाँ। अगर उन कहानियों को अलग से संकलित किया जाए तो एक उपन्यास बन जाएगा, क्योंकि सभी कहानियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई है। इस कृति के हर अलग अध्याय के लिए नाटकीय शैली में लिखी अलग-अलग कहानियाँ और उससे सम्बद्ध रखने वाली अलग-अलग कविताओं का समुच्चय संग्रहीत है । कवि की कल्पना-शक्ति का कहना ही क्या!
कवि ने भाषा-विज्ञान की अतल गहराई को भी स्पर्श किया है। उदाहरण के तौर ‘कुंडलवन’ और ‘पृथ्वी सूक्त’ पांडुलिपि की भाषा पालि, , ‘ब्रह्मावर्त’पांडुलिपि की संस्कृत, ‘तंत्रालोक’और ‘आनंदवल्ली’की भैक्षुकी तथा ‘लोपामुद्रा’पांडुलिपि की शारदा लिपि की कल्पना करना उनका भाषा-विज्ञान के प्रति अगाध स्नेह को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार प्रोफेसर आनंद न केवल कवि अथवा कहानीकार है, बल्कि भाषा वैज्ञानिक, इतिहासज्ञ, समाजशास्त्री, दार्शनिक और अति-संक्षिप्त में कहा जाए तो सच्चे मानवतावादी प्रज्ञाशील पुरुष हैं, जो मनुष्यता की रक्षा के लिए हर पल विप्लव के लिए तैयार रहते हैं। उनकी निरीक्षण शक्ति अत्यंत ही सूक्ष्म हैं, विशाल प्रशांत महासागर में गोते लगाकर मोतियों को खोजने की तरह सागापाली, पटना, सुसनेर, हौशंगाबाद और भोपाल में अपनी सारगर्भित-संवेदनशील यात्राओं के दौरान कहानियों के जटिल कथानकों को तलाश लेते हैं।
हो सकता है,साधारण आधुनिक पाठक को इस कृति में कहीं-कहीं क्लिष्ट शब्दों से पाला पड़ सकता है, मगर भाषा को जीवित रखने के लिए उनके द्वारा उठाया गया यह कदम न केवल सराहनीय है, बल्कि अनुकरणीय और स्वागत-योग्य है। अगर पाठक उपोदघात्, दलित-द्राक्ष, सहस्रशीर्ष, प्रति नारायण, लोपामुद्रा, हिरण्य गर्भ, जम्बूद्वीप जैसे अनेक शब्दों को आत्मसात नहीं करेगा तो हमारी देवभाषा कैसे जीवित रहेगी? कवि ने जान-बूझकर पौराणिक पात्रों के नामों जैसे दीर्घतमा, श्वेतकेतु, वृद्धश्रवा, मातरिश्वा, मधुच्छंदा, अगस्तय, अपाला आदि तरह-तरह नाम वाले सुमनों से इस कृति की माला गूँथी है, ताकि हमारी वर्तमान पी़ढ़ी कम से कम हमारे पूर्वजों के भाषायी ज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक, वैचारिक उन्नति से परिचित हो सके तथा उन पात्रों से प्रेरित होकर आगामी पीढ़ी के लिए अपने विवेकानुसार सद्साहित्य की रचनरूपी अनमोल धरोहर विरासत में प्रदान कर सकें। प्रोफेसर आनंद की दूरदर्शिता हमारे देश को फिर उन्नति के शिखर पर देखने के साथ-साथ अतीत के गौरव को याद रखने हेतु प्रेरित कर रही है।
प्रो. गोरास्या ने अपने इस आलोचना-ग्रंथ में जगह-जगह पौराणिक मिथकीय कथाओं की उत्पत्ति और वर्तमान संदर्भ में उपयोगिता की विवेचना करने के साथ-साथ अंग्रेजी कविताओं के गूढार्थ की ओर भी ध्यानाकृष्ट किया हैं। प्रो. गोरास्या का विश्लेषण पढ़ते समय आपको लगेगा कि आप केवल भारत भूखंड के अधिवासी नहीं हैं, केवल पृथ्वीवासी नहीं है, बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड पर आपका आधिपत्य है। ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ की धारणा यहाँ ‘ब्रह्मांड कुटुम्बकं’ में परिणित होती नजर आती है। कभी एक जमाना था कि हमारे देश को ब्रह्मावर्त कहे, आर्यवर्त कहे या जंबूद्वीप कहे या आधुनिक समय के अनुसार भारत, इंडिया, हिन्दुस्तान कहें, ज्ञान की खोज में यहाँ देश-विदेशों के लोग आते थे।उदाहरण के तौर पर फाहयान, ह्वेनसांग, इत्सिंग, मार्कोपोलो, अलबरूनी, इब्नबतूता, ट्रेवनियर, डोमिंग पेज आदि यात्रियों ने तत्कालीन भारतीय संस्कृति को नजदीकी से जानने का प्रयास किया। नालंदा और तक्षशिला के विश्वविद्यालय भारत के तत्कालीन विश्व-गुरू होने का सबूत देते हैं तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान का विदेशी भाषाओं चीनी, इरानी, तुर्की तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से विश्व के कोने-कोने में पहुँचना आज भी हम सभी को आश्चर्य चकित कर देता है कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान, भाषा, अनुवाद के क्षेत्र में कितना आगे तक पहुँच चुका था।
डॉ. गोरास्या ने ‘अथर्वा’ की प्रत्येक पांडुलिपि पर गहराई से प्रकाश डाला है, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना अत्यंत कठिन है, फिर भी प्रमुखता से वैदिक संस्कृति, बौद्ध धर्म, सृष्टि और भाषा की उत्पत्ति, देश की अस्मिता, तातनियम (शनि ग्रह का उपग्रह जिसे अंग्रेजी में टाइटेनियम कहते हैं, कवि ने इस शब्द का हिन्दी में तातनियम नाम से अनुकूलन किया है) पर प्रलय, नासदीय सूक्त, कुंडलिनी शक्ति, वर्णाश्रम की कुप्रथा, प्रजातंत्र की समस्याएं, प्राचीन भारत की गौरव-गरिमा, अस्तित्ववादी दर्शन, आतंकवाद, अपाला की उन्मुक्त नारीवादिता, अथर्वा के पुरूष वर्चस्ववादी विचार, बढता पूंजीवाद और सामाजिक विद्रूपताएं, गुंडाराज, पृथ्वी की दुर्दशा, पर्यावरणीय चिंता जैसे अनेक मुद्दों पर सरल सहज भाषा में पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।
‘अथर्वा’ की रचना-प्रक्रिया के पूर्व परिचित होने के कारण प्रोफेसर गोरास्या के लिए पांडुलिपि के हर पात्र-काल-स्थान को अपनी आलोचनात्मक पुस्तक में बाँधना सहज रहा है। इस पांडुलिपि की कविताओं में उन्होंने देल्फी की अपोलो, फेनजाया अफ्रोदीति का मंदिर, आल्पस और यूराल के हिम-पर्वत, मिश्र के तूतेनखमान का मकबरा, शीबो का महल, नियाग्रा का झरना, गज्जानी के काले पिरामिड, ड्रेगन का सिंहासन, हिंदुकुश के सौदागर, जापान द्वीप की घाटियां, अवंतिका के वन, शाकपल्ली का संघाराम, प्रयाग, यमुना, अंकोरवाट, पीर पंजाल पर्वत, मानसरोवर के अतिरिक्त मूसा, हजरत, रूबी, खय्याम, सनैई, जुबैद, राबिया, चंगेज सिजिंग, शंकराचार्य, वेदव्यास, शुक मुनि, शूद्रक, मीरा, पदमावती, जनक-सुलभा, भर्तहरी, निषाद कन्या, गोपीचंद, गोरखनाथ, अष्टावक्र, अगस्त मुनि, अशोक, समुद्रगुप्त, परशुराम, महेन्द्रगिरि, कालिदास, आलवर-पेरियर आदि की तरफ संकेत करते हुए लिखा है कि साधक कवि मानो योगनिद्रा में विदेह होकर पूरे विश्व का भम्रण कर बड़ी-बड़ी पुण्यात्माओं का साक्षात दर्शन कर अपने शरीर में फिर से प्रवेश कर रहा हो। इस प्रकार ये कविताएं नहीं हैं, बल्कि योगनिद्रा की चरमावस्था में साधना की पृष्ठभूमि है। इसी तरह, उनकी ‘मायादर्श’ पांडुलिपि की कविताओं में जादुई शीशे की प्रतीति होती है। जब शीशा उत्तल होता है तो उसमें आइंस्टीन रामानुज, लीलावती, अर्विन श्राडिंगर, सिग्मंड फ्रायड, फूको, लाहिड़ी महाशय, एनीबीसेंट, गार्गी, हिटलर, रामकृष्ण परमहंस, श्री अरविंद, दयानंद, विवेकानंद, रमण महर्षि, रजनीश, प्लेटो, मार्क्स, मूर, महात्मा गांधी, लोहिया, डॉ. अंबेडकर, महादेवी वर्मा, अंडाल, पंप, इलियट, जनरल डायर, टैगोर, नेहरू, लार्ड कर्जन, भगत सिंह, आशफाकुल्ला, सहजानंद, राहुल सांस्कृत्यायन, तिरूकुरूल, फणीश्वर नाथ रेणु - जैसी विश्व की महान विभूतियों के दर्शन होते हैं और जब वह दर्पण अवतल होता है तो महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी, पदमिनी, चंदबरदाई, पृथ्वीराज, संयोगिता, पेशवा बाजीराव, जयचंद, मीर जाफर, हर्षवर्धन आदि के चेहरे नजर आते हैं और दर्पण की समतल अवस्था में अलाउद्दीन, महमूद गजनवी, औरंगजेब, वाजिद अलीशाह सभी कवि-सम्मेलन के मंच पर दिखने लगते हैं। दर्पण की तीनों अलग-अलग अवस्थाओं में भारत के पौराणिक, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास के दृश्यों के साथ-साथ विश्व की महत्वपूर्ण घटनावलियों को कविता में बाँधना प्रोफेसर आनंद का अभिनव प्रयोग है, जिसे दूसरे शब्दों में विश्व इतिहास की काव्यिक झाँकी(Poetic Glimpses of World History) कहा जा सकता हैं। इस अभिनव प्रयोग से यह भी सिद्ध होता है कि कविताएँ केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं होती, बल्कि कविताओं में समग्र ज्ञान अर्थात् विज्ञान, इतिहास, भूगोल, दर्शन, गणित, साहित्य, राजनीति, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि विषयों को गूँथा जा सकता है, ताकि विद्यार्थियों का एकांगी विकास न होकर उनका सर्वांगीण विकास हो। मगर ऐसी कविताओं की रचना तो तभी संभव है जब कवि बहुपठित और ज्ञान का भंडार हो। इस कसौटी पर प्रोफेसर आनंद पूरी तरह खरे उतरते हैं। वे कविता को ‘एस्केप फ्रॉम पर्सनलिटी’ नहीं मानते हैं। उनके शब्दों में,
“कविता पलायन नहीं, संघर्ष क्षण है
कवि कलाकार का स्पंदित विभव ही
बहकर कृति में होता विभाजित” (अथर्वा : मायादर्श : पृष्ठ-286)

क्या कभी कवि और कविता एक-दूसरे से अलग हो सकती है? कवि का ज्ञान ही तो कविता की रचना में बहकर आता है। क्या कविता से उस ज्ञान को पृथक किया जा सकता है? प्रोफेसर गोरास्या का यह कथन पूर्णतया सही प्रतीत होता है कि प्रोफेसर आनंद का व्यक्तित्व ही उनका कृतित्व है। अपनी कृति ‘अथर्वा’ की तरह उनका व्यक्तित्व भी विशाल है।
प्रोफेसर आनंद फ्रिजॉक काप्रा की पुस्तकों ‘सिस्टम्स व्यू ऑफ लाइफ’ तथा ‘ताओ ऑफ फिजिक्स’से प्रभावित है। प्रोफेसर आनंद खुद मानते है कि आधुनिक वाणिज्यिक गतिविधियों में केवल प्रकृति का दोहन किया जाता है, उसके संरक्षण की बात किसी के मन में नहीं आती, जिस वजह से कोविड जैसी वैश्विक महामारी, आँधी, तूफान, बाढ़, ग्लेशियरों का पिघलना, ओजोन होल में छेद, वन्य जीव-जंतुओं का अंधा-धुंध नाश हो रहा है। आज भी आध्यात्मिक चेतना के सवाल हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। पर्यावरणीय चेतना भी तो आध्यात्मिक चेतना ही है। जिसे कवि ‘डीप इकॉलोजी’ कहते हैं। अपनी पांडुलिपि ‘आनंद वल्ली’’ में शांतिपाठ कविता में पृथ्वी ,दिशाओं, समुद्रों, वनस्पतियों, औषधियों, राजनीति, वाणिज्य, अपकारक शक्तियों के शांत होने की प्रार्थना की है। यह कविता दूसरे कवियों को भी पर्यावरण के बारे में अपनी रचनाओं के लेखन हेतु प्रेरित करती है। कवि-धर्म विश्व के सभी घटकों के प्रति समान रूप से सम्मान देना है। यही ही नहीं, जिस घटक का ज्यादा क्षय हो रहा हो, जिन मूल्यों का ज्यादा अवमूल्यन हो रहा हो, उनकी तरफ जन-मानस का ध्यान आकर्षित करना महान कवि की मुख्य पहचान है। कवि पुरातन मुल्लमे को घिसने वाला नहीं होकर भविष्य दर्शी होना चाहिए। उनकी कविताओं में हमारी संतति के लिए भविष्य में क्या चुनौतियाँ आएगी और उन्हें उनसे निपटने के लिए उन्हें कैसे सक्षम बनाया जाए आदि- विषयों पर आवाज उठानी चाहिए। दोनों प्रोफेसर मित्रों आनंद और गोरास्या की रचनाएँ इसी संदेश को सार्थक करती हैं।
‘अथर्वा’ की कहानियों को पढ़ते समय मैंने यह अनुभव किया है कि पौराणिक, ऐतिहासिक पात्रों और जगहों को कथानकों में पिरोकर जिस जीवंत भाषा-शैली का प्रयोग प्रोफेसर आनंद ने किया है, इससे पाठकों को ऐसा लगता है मानो वे किसी दूसरे लोक या तिलस्मी जगहों की यात्रा कर रहे हो। इस मनोदशा की अवस्था में पाठकों को देवकी नंदन खत्री के बहुचर्चित अपन्यास ‘चंद्रकांता संतति’ और जे. के. राउलिंग के उपन्यास ‘हैरी पाटर’की याद आना स्वाभाविक है। ‘अथर्वा’ इसी श्रेणी की कृति है क्योंकि इसकी कहानियों के कथानकों और पात्रों का वर्णन इतना सशक्त है कि आँखों के सामने जादू की तरह उनकी यथार्थ छबियाँ उभरने लगती है। पद्म विभूषण से सम्मानित द्विभाषी लेखक मनोजदास की ‘जादुई यथार्थवाद’वाली कहानियों से उनकी तुलना की जा सकती है।
इस कृति में विश्व के अलग-अलग जगहों की संस्कृति, परिवेश, भाषा, ऐतिहासिक पात्रों और भौगोलिक स्थलों की ललित-कल्पना पाठकों के मन में तीव्र जिज्ञासा पैदा करती है और उन्हें अंत तक अनवरत पढ़ने के लिए भी बाध्य करती है। बौद्धधर्म की पारिभाषिक शब्दावली जैसे उदंती, चक्रमण, निब्बाण, मणिपदमेहुम, ब्रीहि, महाथेरी आदि; उर्दू शब्दावली मामलुक, इल्म, कल्मी आदि ; विश्व इतिहास के पात्र जैसे अलबिरूनी, वर्नियर, मार्कापोलो, इब्नबतूता आदि और विश्व-विख्यात भौगोलिक स्थान नाइजर दरिया, टिम्बकटू फरगाना, ख्वारिज्म, ट्रांसआक्सियाना आदि के अतिरिक्त आध्यात्मिक शब्दावली का भरपूर प्रयोग और त्वरित भाषा-शैली कृति की अद्वितीयता और कालजयी के होने की कसौटियों पर खरी उतरती है, वैश्विक साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाती है, मगर सभी विषयों पर पारंगत नहीं होने के कारण साधारण पाठकों की पठनीयता में अवश्य अवरोध पैदा होता है।
‘समुद्र कल्प’ के कथा-सूत्र एक भविष्यवाणी – बुद्ध-प्रतिमाओं को औरंगजेब, नादिरशाह और अब्दुर्रहमान नहीं तोड़ पाएंगें, मगर बारूद के आविष्कार होने के बाद तालिबानी तोड़ पाएंगें - पर आधारित है। इसके अतिरिक्त, इस पांडुलिपि में विश्व की पुरातत्विक स्थलों के साथ-साथ धर्मचक्र के प्रवर्तन का भी वर्णन है। इस तरह इस पांडुलिपि में कथा-संयोजन की नई शैली उभर कर सामने आती है, जबकि ‘पृथ्वीसूक्त’ पांडुलिपि की भाषा-शैली हिन्दी सिनेमा की पटकथा से काफी हद तक मिलती-जुलती है।
‘अतिमानस’ पांडुलिपि ‘अथर्वा’ के कवि आनंद और ‘अथर्वा महाक्रांति’ के रचनाकार प्रसिद्ध आलोचक प्रो. गोरास्या दोनों के अंतरात्मा की आवाज है। दोनों मित्र अरविंद- दर्शन से प्रभावित है। कवि आनंद ने ‘अथर्वा’में ‘अतिमानस’ पांडुलिपि को अलग अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें वे अरविंद की परिकल्पना ‘मानव से अतिमानव’ का अनुमोदन करते हैं और उनके आलोचक प्रो. गोरास्या अरविंद के महाकाव्य ‘सावित्री’ उद्धरणों का इस अध्याय की व्याख्या में जगह-जगह पर तुलना करते हुए अकाट्य उदाहरण देते हैं। इस पांडुलिपि में अतिमानस शक्ति वाले महापुरूषों में श्री अरविंद, सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिए आदि के चरित्रों की ओर संकेत किया है। विश्व की मानव सभ्यता को प्रभावित करने वाली विश्व विख्यात पुस्तकों में जैसे ‘मेन एण्ड सुपरमेन’(जार्ज बर्नाड शा), ‘वन डायमेंशनल मेन’ (हार्बर मारक्यूज), ‘रिवोल्यूशन फॉर द हेल आफ इट’ (एनी हाफमैन), ‘गुलांग आर्किपिलांग’(सोल्झेनेत्सिक), ‘मेन ऑफ मेज’(अस्तूर्या), ‘आ हार्ट सो व्हाइट’(जेवियर मेरिया), ‘रिंग ऑफ सैटर्न ‘ (जार्ज वेटल्स) आदि के उपदेशों, कथनों, उद्धरणों तथा पंक्तियों का अत्यंत ही खूबसूरत ढंग से प्रयोग किया गया है। इस औद्योगिक युग में जहाँ विज्ञान एवं तकनीकी आध्यात्मिकता पर हावी होती जा रही है, जहाँ मनुष्य के सोचने का ढंग एकविमीय होता जा रहा है, वहाँ श्री अरविंद का अतिमानस दर्शन ही एकमात्र समाधान नजर आता है, जो भौतिक और आध्यात्मिक विकास के बीच संतुलन की राह खोजता है। इस तरह ‘अथर्वा’ एक उदात्त महाकाव्य है, जिसका प्रयोजन जीवन चतुष्टय की प्राप्ति है। ‘अथर्वा’ आधुनिक युग का ‘अथर्ववेद’ है क्योंकि इस ग्रंथ में अथर्ववेद की तरह ही भूगोल, खगोल, राजनीति, इतिहास, राष्ट्रभूमि, राष्ट्रभाषा की महिमा, अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धांतों के अतिरिक्त साधना, मोक्ष आदि लोकोपकारक विषयों पर गहन कविता पाठ एवं प्रगल्भ विमर्श हुआ है। आज संवेदनहीन युग में जहाँ कविताएं मर रही हैं, वहाँ ‘अथर्वा’ साहित्यनुरागियों, नवोदित रचनाकारों, समीक्षकों, आलोचकों के लिए विपुल काव्य-प्रांतर प्रस्तुत करता है, जहाँ वे अपनी इच्छानुसार अपने विषयों की खोज कर सकते हैं।
‘अथर्वा’ की छंद योजना पारंपरिक महाकाव्यों से पूरी तरह अलग है। कहीं कविताएं छंद-बद्ध हैं, तो कहीं छंद-मुक्त। कहीं फैंटेसी के जाल है तो कहीं ललित-कल्पना की उड़ान। कहीं सपाट बयानी है तो कहीं अंतरलय बद्ध पंक्तियाँ और कहीं-कहीं तो ध्वन्यात्मक शब्दों की अनुगूंज। इस प्रकार इस महाकाव्य में कवि ने अपनी कविताओं में छंदों की विविधता, अंतरलय, ध्वन्यात्मकता, अलंकारों के अभिनव प्रयोग आधुनिकता/उत्तर आधुनिकता के दृष्टिकोण से किए हैं। बहुलभाषी भारतदेश की विविधताओं की तरह यहाँ कवि को क्यों अलग-अलग शिल्पों के समावेश की जरूरत पड़ी? इसका सही उत्तर तो केवल कवि ही दे सकतें हैं।फिर भी मैं प्रो. गोरास्या के इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ कि अलग-अलग परिवेश में दीर्घकाल तक रचना करने की वजह से कवि के मनोभाव, कविता की अंतर्वस्तु और परिवेश में परिवर्तन आने के कारण कवि की भाषा-शैली में बदलाव आना स्वाभाविक हैं।
प्रोफेसर आनंद की मूल रचना ‘अथर्वा : मैं वही वन हूँ’पर प्रोफेसर गोरास्या अपनी आलोचनात्मक कृति ‘अथर्वा : महाक्रांति’ की रचना करते हैं। गणितीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो, मैं वही वन हूँ = महाक्रांति। वन यहाँ महाक्रांति का प्रतीक है। ‘कुंडलवन’ में वन कुंडलिनी शक्ति का द्योतक है तो ‘पृथ्वी सूक्त’ में वन विश्व की विसंगतियों तथा विद्रूपताओं पर अट्टहास करने वाली विध्वंसक शक्ति का, जबकि ‘जम्बूद्वीप’में वन प्रजातंत्र के नकारात्मक स्वरूप को प्रदर्शित करता है। वन के ये तीनों अलग-अलग अर्थ महाक्रांति की सूचना देते है, आंतरिक और बाह्य दोनों क्रांतियों की एक साथ। अतः ‘अथर्वा : महाक्रांति’शीर्षक महाभारत,महाभाष्य, महाकाव्य आदि शब्दों की तरह सुसंगत और उचित प्रतीत होता है।
प्रो. गोरास्या ने ‘अथर्वा: एक महाक्रांति’ में प्रोफेसर की ‘अथर्वा’ के सोलह अध्यायों की अपने ढंग से व्याख्या की है। दूसरे शब्दों में, उनकी कविताओं के गूढार्थों को खोजने का प्रयास किया है। जिस तरह गीता में अर्जुन और कृष्ण के अठारह अध्यायों तक संवाद होते हैं, वैसे ही अथर्वा जैसे आधुनिक महाकाव्य में दीर्घतमा और अथर्वा के काव्यात्मक वार्तालाप के सोलह अध्याय है। दीर्घतमा नामकरण के पीछे शायद कवि का यह उद्देश्य ऐसी आत्मा का चित्रण करना है, जो दीर्घ समय से तमस में डूबी हुई है और जिसे जीवन जीने का अर्थ नहीं मिल पा रहा है। उस अर्थ की तलाश अथर्वा से होती है। इस तरह दीर्घतमा और अथर्वा अर्थात् शिष्य और गुरू की जोड़ी अपने मन के भावों को प्रस्तुत करती हैं। एक प्रश्न करता है तो दूसरा उत्तर देता है।‘हिरण्य गर्भ’ पांडुलिपि ह्वेनसांग को तक्षशिला में मिलती है, इसमें काव्यपाठ आत्माहुति, स्वस्ति आवाहन, आद्या, शब्द गायत्री, वनवृन्द, तातनियम पर प्रलय, चिरंतन पृच्छा, महाविस्फोट, नासदीय सूक्त पर कविताएं है। पहला प्रश्न दीर्घतमा पूछते है,
बताओ हम क्या थे उस मूलारम्भ चक्र में
पदार्थमय में गति का चंक्रमित अमित अंधकार
अथवा था चेतना का पुष्कल जागरण?
अथर्वा से पूछा गया यह सवाल उदभ्रांत की दीर्घ कविता ‘अनाद्य सूक्त’ में सृष्टि की उत्पत्ति से मिलता-जुलता है। प्रारंभ में ईश्वर थे तो कैसे थे, कहाँ थे, रूप या अरूप में? सृष्टि कैसे बनी? प्रो. गोरास्या के इस मत से मैं सहमत हूँ कि इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए शब्द अपर्याप्त है, मगर अथर्वा उत्तर देता है - महाविस्फोट से सृष्टि बनी। उनके शब्दों में,
एक विकल्प से खेलते हुए महाविस्फोट की तरंगें
मढ़कर सोने की भाप से
सारे ब्रह्मांड का प्रकाशवर्षी इतिहास
चली गई है महादूर.......( अथर्वा, हिरण्यगर्भ, पृ.64 )

प्रोफेसर आनंद की उपर्युक्त पंक्तियों में मुझे भौतिक विज्ञान के पारिभाषिक शब्द जैसे ‘महाविस्फोट’, ‘तरंगें’ तथा ‘प्रकाशवर्ष’ पढ़ने को मिले और इन पंक्तियों की व्याख्या प्रो. गोरास्या भी वैज्ञानिक तरीके से ही करते हैं। वे कहते हैं, ब्रह्मांड की उर्जा न तो पैदा होती है, न नष्ट होती है। वह केवल अपना रूप बदलती है। कभी आकार तो कभी निराकार। यह उर्जा केवल ब्रह्मांड में ही नहीं है, पिंड में भी है। जिसे कवि आनंद ‘वैश्वानर’ कहते हैं तो प्रोफेसर गोरास्या इसके लिए अरविंद के आध्यात्मिक शब्द ‘Mystic fire’ का प्रयोग करते हैं। यह उर्जा बाहर भी है और भीतर भी। इस उर्जा को पहचानने की प्रक्रिया में कवि आनंद द्वारा साधनारत अवस्था में रचित कविताओं को श्री अरविंद के शब्दों में ‘सुप्रामेंटल पोएट्री’, कोलरिज की भाषा में ‘सुपर नेचुरल पोएट्री’, इमर्सन के शब्दों में ‘ट्रांसडेंटल’ तथा टी. एस. इलियट की भाषा में ‘इंपर्सनल पोएट्री’ कहते हैं। प्रो. गोरास्या अंग्रेजी के प्रोफेसर है,अतः ‘अथर्वा’ की हिन्दी कविताओं में ख्याति-लब्ध अंग्रेजी कवियों कोलरिज, इमर्सन, टी. एस. इलियट और श्री अरविन्द की तरफ रूझान होना स्वाभविक है। मगर मैं कवि आनंद को कबीर के नजदीक पाता हूँ। आनंद कहते हैं,

अनाम अकाल पुरूष का सर्वग्रासी ज्वालानल
हमारी साँसों में वैश्वानर बन बैठा है
इसी आग में जलना मोक्ष है।
कबीर भी इस अनाम अकाल पुरूष को अपनी साँसों में ही खोजते हैं। उनके बारे में कहते हैं,
न मैं मंदिर, न मैं मस्जिद
न काबे, कैलाश में
खोजी होए तो तुरंत
मिलियों इन साँसों की साँस में।
कबीर का ‘मैं’ और आनंद का ‘वैश्वानर’ दोनों एक ही है।
‘हिरण्य गर्भ’ की कविताओं के माध्यम से कवि सर्वप्रथम सभी मनुष्यों को आष्टांगयोग द्वारा अतिमानस स्तर तक चेतना के विस्तार का आह्वान करता है। जब हम उच्च चेतना-स्तर में होंगे तो बाकी सब भ्रष्ट चीजें पीछे छूट जाएगी। आज हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार उस चेतना के अधोगमन और अवक्षय के कारण है। जब प्रत्येक व्यक्ति उसी चेतना का विस्तार व विकास कर लेगा तो उसके लिए समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार कुरीतियों, विद्रूपताओं और विसंगतियों का उन्मूलन करना सहज व साधरण कार्य होगा।
अपने भीतर झाँकने के साथ-साथ समाज को यथार्थ धरातल पर देखने तथा दिखाने वाली कविताओं का संग्रह है, उनकी दूसरी पांडुलिपि ‘वातायन’, जिसका संदूक ह्वेंसांग को सिंधु नदी में प्राप्त होता है, जिसमें तातनियम पर घटी घटनाओं पर कविताएं है।यहाँ वह अथर्वा से पूछता है -
“इतिहास का नाम है जटिलता
जिसका अर्थ खुल नहीं पाता है।”
ऐसा क्यो? .......( अथर्वा, वातायन, पृष्ठ-78 )

मैंने इतिहास की असार्थकता के बारे में ओशो रजनीश की किसी किताब में एक सटीक प्रसंग पढ़ा था । घटना इस प्रकार थी, किसी अपार्टमेंट की चौथी-पाँचवी बिल्डिंग से कोई औरत नीचे गिरकर मर जाती है। उसे देखने के लिए भीड़ जुट जाती है। कोई कहता है, इसने आत्महत्या की है। कोई कहता है किसी ने इसे धक्का दिया है। कोई कहता है किसी ने मर्डर कर नीचे फेंक दिया है। जितने मुँह उतनी बातें। सत्य क्या है? कौन जानता है? ओशो कहते हैं कि कुछ पल पूर्व घटित घटना पर लोगों के मत-मतांतर पूरी तरह भिन्न हैं तो सभ्यता के शुरूआती दौर में अथवा वेदों की रचना के समय या रामायण/महाभारत काल में हुई घटनाओं को घटित हुए हजारों साल बीत गए, हमारी कई पीढियाँ पार हो गई तो उनमें कितने मत-मतांतर पैदा हुए होंगे? निस्संदेह,असंख्य। यही वजह है इतिहास अत्यंत जटिल है, उसका सही अर्थ खुल नहीं पाता है। यहाँ तक कि लोग सत्य को भूलकर मिथकों को भगवान मानना शुरू कर देते हैं। मैं इस सवाल को प्रोफेसर गोरास्या जी के मन की बात मानता हूँ, न कि दीर्घतमा का। मैं स्वयं असमंजस की स्थिति में हूँ कि इतिहास में रूचि रखने वाला ‘अथर्वा’ इस प्रश्न का उत्तर निराशावादी स्वर में क्यों देता है? सलाह के तौर पर उसे कहता है,
इतिहास से नाता मत जोड़ो
क्योंकि इसकी क्रूरता तुम्हें अनंत काल तक तड़पाती
और विषाक्त हवा में सांस लेते हुए
तुम अचानक ही घृण्य हो जाओगे। .......( अथर्वा, वातायन, पृ.81 )

यहाँ प्रोफेसर गोरास्या जे. कृष्णमूर्ति प्रदत्त मन को शून्य करने की सलाह पर विचार करते हैं। उनके अनुसार अगर मन शून्य होगा तो आत्मा शुद्ध होगी। अगर आत्मा शुद्ध होगी तो भाषा बदल जाएगी और अगर भाषा विनीत हो गई तो इतिहास सकारात्मक ढंग से लिखा जाएगा। मगर अथर्वा अच्छी तरह जानता है कि मन कभी शून्य नहीं हो सकता है। हर पल कोई न कोई विचार बहुरूपिए की तरह अपना रूप बदल-बदलकर मन पर आक्रमण करता है। शून्य रहित मन की कल्पना ही गलत है, इसलिए अथर्वा मन को शून्य बनाने की जगह संवेदनशील बनाने की सलाह देता है। दूसरे शब्दों में, वह उसे कवि बनने की प्ररेणा देता है। तभी इतिहास के अनर्थ को अर्थ में बदला जा सकता है। अपने बारे में और अपने परिवेश के बारे में चिंतन-मनन-ध्यान ही इतिहास को सार्थक बनाने का पहला कदम है। उनके शब्दों में,
जब भी संवेदना की वत्सल पुकार लगाओगे
बेकल गायों-सी भाषा तुम्हारी ओर दौड़ेगी
तुम्हें फिर भी खोजना होगा अर्थ
अपनी ही निद्रा में जागकर! समझे। .......( अथर्वा, वातायन, पृ.83 )

संवेदना की वत्सल पुकार क्यों?
गायों-सी भाषा?
निद्रा में जागकर?
वत्सल पुकार जैसे गाय का खोया हुआ बछड़ा उसे पाकर रंभाने लगता है, जैसे कोई शिष्य अपने गुरू के सम्मुख समर्पण भाव से विनती करने लगता है या जैसे पानी में डूबता हुआ कोई प्राणी आक्सीजन पाने के लिए तड़प कर पुकार उठता है या मगरमच्छ द्वारा समुद्र में खींचे जा रहे गज की आर्त-पुकार । वत्सल पुकार तो तभी संभव है, जब कोई भी जीव दूसरे दुखी प्राणी को देखकर उसकी जगह अपने को रखकर सोचे कि काश! मुझे ऐसा दुख नहीं मिलता। जैसे शाम होते ही गायें अपने घर जाने के लिए बेताब रहती है, अपने बछड़े के वात्सल्य भाव से चाटने के लिए, वैसे ही संवेदनशील व्यक्ति के मन में भाषा स्वतः दौड़ी चली आएगी वैचारिक मंथन के लिए, विवेक जागरण के लिए । यह विवेक ही आत्म-मंथन है, योग-निद्रा है, ध्यान-धारणा है, शब्दों में अर्थ की तलाश है। ये गुण योगी के भी हैं और कवि के भी। यहाँ अथर्वा योगी भी है और कवि भी। प्रोफेसर आनंद के शब्दों में संवेदनशील हृदय वाला विवेकशील पुरूष कवि बन सकता है, जिसकी पुष्टि अनके आलाचक मित्र गोरास्या अरविंद के शब्दों में करते हैं।
“ Do not belong to past dawns,but to the noons of the future.”
अथर्वा के अनुसार रात को सोते समय साधक दृष्टाभाव का आदि हो जाता है और यह भाव ही कवि हृदय को जन्म देता है अर्थात् कविता के लिए साधना अनिवार्य है ।
मगर साधना में बाधाएँ भी बहुत हैं । इस संदर्भ में दीर्घतमा के कुछ प्रश्न हैं जैसे
इस पथ में केवल अंधकार ही अंधकार है?
अतिमानसिक अनुभव वालों की अवस्था कैसे होती है?
क्या साधक पथ-भ्रष्ट का पद-च्युत हो सकता है?
मैं दिव्य-निराशा से क्यों गुजर रहा हूँ?
क्या हम आध्यात्मिक क्रांति के अग्रदूत बन सकेंगे?
क्या हमारा देश विश्व-गुरू बन सकेगा?
क्या कुंडलिनी शक्ति जागृत करने की पात्रता हमारे भीतर है?

अथर्वा की ‘वातायन’ पांडुलिपि में इन सारे सवालों का सटीक उत्तर पाते ही दीर्घ समय से अंधेरे में विलुप्त सांप की तरह अढ़ाई कुंडली मारे बैठी कुंडलिनी फुंफकार कर कुंडल वन की ओर प्रवेश करती है। जो अथर्वा की कुंडलिनी-जागरण के दौरान अर्जित अनुभवों का वर्णन है। कहा जाता है, ये अनुभव न तो किसी को बताए जाते और न ही शब्दों में अभिव्यक्त किए जाते है क्योंकि ऐसा करने पर साधक के जीवन में कई दुष्परिणाम सामने आ सकते है। जिस तरह न्यूक्लिअर रियेक्टरों में परमाणुओं का विखंडन होता है और उत्सर्जित नाभिकीय ऊर्जा को सहन करने के लिए रियेक्टर की दीवारें मजबूत होनी चाहिए, वैसे ही कुंडल-वन में भ्रमण करने वाले व्यक्ति के देह की दीवार उतनी ही पुष्ट, सख्त और मजबूत होनी चाहिए ताकि कुंडलिनी साधना के दौरान उत्पन्न हुई उष्मा और आंतरिक परमाणुओं के विस्फोट को वह बर्दाश्त कर सके, अन्यथा स्नायु-तंत्र तथा मस्तिष्क की नसों पर ज्यादा दबाव या ताप गिरने से पागल होने का खतरा सदैव मंडराता रहता है। संबलपुरी भाषा के सुप्रसिद्ध कवि पद्मश्री से सम्मानित हलधर नाग अपने काव्य ‘श्री समलेई’, ‘महासती उर्मिला’, ‘रसिया कवि’,‘शबरी’,‘तारा-मंदोदरी’ की रचना के दौरान अपने कानों के भीतर देवी समलेई की फुसफुसाहट सुनते है, वैसा ही आलौकिक अनुभव कवि आनंद का भी है। अतिमानस उनसे कविताएं लिखवाने के लिए कानों में बोलता था,करवटें बदलवाता था और पलंग पटकता था। गीता के प्रमुख टीकाकार मधुसूदन सरस्वती अपनी टीका लिखते समय कृष्ण भगवान की उपस्थिति तो राम-चरित मानस की रचना के दौरान तुलसीदास हनुमान जी को अपने इर्द-गिर्द अनुभव करते थे। समकालीन कवियों में उद्भ्रांत जी ने गीता के हिन्दी अनुवाद ‘प्रज्ञा वेणु’ के दौरान अपने भीतर ऐसा ही अनुभव किया था। भले ही, इसमें कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं है, फिर कवियों के अपने-अपने अनुभव हैं। मेरुदंड में सर्पिणी द्वारा चक्रभेदन विज्ञान सम्मत नहीं है, इसका मतलब यह भी नहीं है कि ऐसा होता ही नहीं है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने किसी मुर्दे की लाश फाड़कर शरीर के भीतर छः चक्रों मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, मनाहत, विशुद्धि, आज्ञा को खोजना चाहा, मगर उन्हें उनकी उपस्थिति के सबूत नहीं मिले। इसका अर्थ यह भी नहीं लिया जा सकता है कि सदियों पुरानी यौगिक पंरपराओं वाली भारतीय साधनाओं में यह अनुसंधान असत्य है। योगियों की आत्मकथा पढ़ने पर या स्वयं योग-साधना में लीन होने पर या गुरू के आशीर्वाद से या फिर प्रारब्ध के पुण्यों के बल पर यह शक्ति जागृत हो सकती है, मगर अनभिव्यक्त। गीता प्रेस गोरखपुर की ‘पातंजलि योग प्रदीप’ में ऐसी घटना का उल्लेख मिलता है कि कोई योगी कुंडलिनी जागरण के दौरान किसी दिवंगत आत्मा से उसकी वर्तमान अवस्था के बारे में प्रश्न पूछता है तो मानस पटल पर उसका रूप उभरकर सामने आ जाता है, मगर कुछ ही दिनों में उसके शरीर पर चारों तरफ फोफलें पड़ जाते हैं और वह कुंडलवन में हमेशा के लिए भटक जाता है।
इस साधना को श्री मनोज दास दिव्य-पागलपन कहते हैं, इसका खतरा प्रोफेसर गोरास्या जी ने खुद उठाया है।उन्होंने स्वीकार किया, “ प्रोफेसर आनंद ने मेरे भीतर कुंडलिनी शक्ति जागरण की चिंगारी जला दी और मुझे डर लगने लगा कि कहीं पागल न हो जाऊँ?” कभी श्री मनोज दास भी मार्क्सवादी थे, पांडिचेरी आश्रम में श्री अरविंद के आध्यात्मिक शिष्य हो गए। वैसे ही गोरास्या जी मार्क्सवादी थे, सुसनेर में इस कृति की रचना-प्रक्रिया पर वार्तालाप के दौरान प्रोफेसर आनंद के शिष्य बनकर कुंडल-वन में सैर करने लगे। कुंडलिनी जागरण के बाद दीर्घतमा अब दीर्घतमा नहीं रहा। तमस से उजाले की ओर की उनकी यात्रा शुरू हो गई। अब उन्हें प्रश्नों के उत्तर के लिए अथर्वा या अन्य ऋषि-मुनियों के मुँह ताकने नहीं पड़ते थे। सहस्रार बिंदु पर अतिमानस सभी जिज्ञासों का समाधान करने लगा। उन्हें ओडिया कवि भीम भोई की तरह बाह्य चक्षु बंद होने पर भी अपनी अंतरात्मा में सभी लोकों के दर्शन होने लगे। जहाँ-जहाँ नजर जाती, वहाँ-वहाँ ईश्वर ही ईश्वर। हजारों बिंदुओं पर हजारों ईश्वर। तीसरी पांडुलिपि ‘कुंडल वन’ में कुंडलिनि शक्ति से संबंधित कविताएं जैसे ‘सहस्रशीर्ष, ‘विज्ञान वन, ‘अर्धनारीश्वर’, ‘एक निशा’, ‘सच्चिदानंद’और ‘केवल मैं’ में अथर्वा के सूक्ष्म मनोभाव छुपे हुए हैं। अपनी कविता ‘सहस्रशीर्ष’ में वह संसार की सभी वस्तुओं जैसे जीव-जंतु, पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों, फल-फूल, पत्तियों, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी और मानव सभी में ईश्वर के दर्शन करने लगा। ब्रह्मांड को साँस लेते देखा। जब वह साँस लेता है तो सिकुड़ जाता है और जब साँस छोड़ता है तो फैल जाता है। सहस्रशीर्ष के बाद दीर्घतमा का प्रवेश होता है ‘विज्ञान वन’ में।
विज्ञान वन क्या है ?
हमारे शरीर में तीन प्रकार के कोष होते हैं:- अन्नमय, विज्ञानमय और आनंदमय। अन्नमय कोष तो स्थूल शरीर है, उसी में कुंडलिनी जागरण होती है, इसलिए वह कुंडल वन है। कुंडल वन की यात्रा सफल होने के बाद आत्मा प्रवेश करती है विज्ञान वन में, अर्थात् विशिष्ट ज्ञान वाला वन। यह वह वन है, जहाँ विज्ञान और अध्यात्म का टकराव खत्म हो जाता है। जहाँ विज्ञान की सीमा समाप्त होती है, वहाँ अध्यात्म की परिधि शुरू हो जाती है। हमें इसी सीमा पर रहना है, जहाँ विज्ञान और अध्यात्म दोनों बराबर-बराबर शक्ति वाले हैं। यह तो ठीक वैसी ही अवस्था है, जहाँ चाँद और पृथ्वी का गुरूत्वाकर्षण बल बराबर हो जाता है अर्थात् किसी भी वस्तु पर लगने वाला परिणाम बल शून्य हो जाता है। यहाँ फेंकी हुई कोई वस्तु न तो पृथ्वी की ओर जाएगी और न ही चंद्रमा की ओर। कहते हैं, महाभारत काल में भीम द्वारा फेंके गए हाथी यहाँ इसी त्रिशंकु अवस्था में अभी तक लटके हुए हैं। इस सीमा को पार करने के लिए रॉकेटों को अतिरिक्त बल देकर पलायन वेग से ज्यादा गति प्रदान की जाती है, तभी जाकर वह दूसरे उपग्रह के गुरूत्वाकर्षण बल की रेंज में पहुँच पाता है। ऐसी अवस्था विज्ञान वन की है। अगर इंद्रियों ने खींचा तो भौतिकवादी और अगर आत्मा ने आकर्षित किया तो अध्यात्मवादी। प्रोफेसर गोरास्या इस सीमा पर आंइस्टीन का समीकरण (E=mc2) का प्रयोग करते हैं। वे पहले m यानि पदार्थ को सच मान रहे थे, अब E यानि उर्जा (चेतना) को सही मानने लगे हैं। आंइस्टीन तो खुद मानते हैं कि कोई भी पदार्थ कभी भी उर्जा में बदल सकता है और कभी भी उर्जा पदार्थ का रूप ले सकती है। यह तो ठीक वैसा ही हुआ कि आकार से निराकार और निराकार से आकार, सगुण से निर्गुण और निर्गुण से सगुण। इस समीकरण से तो सगुण अैर निर्गुण भक्तों के झगडे़-झंझट, कड़वाहट, वैचारिक मतभेद और साम्प्रदायिक कलह स्थायी तौर पर समाप्त हो जाएँगे। केवल मानने की जरूरत है, विज्ञान वन की सीमा को, आंइस्टीन के ऊर्जा समीकरण और सापेक्षवाद को। प्रोफेसर गोरास्या जी अब विज्ञान वन की तीन अवस्थाओं जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति को मानने लगे हैं ।
सुषुप्त अवस्था में हमारे मन में कुंडलवन की उर्जा से शिव संकल्प पैदा होते हैं और वह लोक-लोकोत्तरों की सैर करने लगता है, जबकि-तुरीयावस्था में वह अतिमानस के साथ जुड़ जाता है। रांडा बर्न की पुस्तक ‘द सीक्रेट’ भी इन उर्जा तरंगों पर अपने अनुभवों की व्याख्या करती है। मैं यह नहीं जानता कि यह प्रो. गोरास्या जी का अपना अर्जित अनुभव है या प्रो. आनंद के शक्तिपात से अर्जित है कि ध्यानावस्था में जब मन शांत होता है तो कानों में शब्द फूटने लगते है और मानस-पटल पर उन शब्दों के चित्र उभरने लगते हैं। जब कोई ध्यान-योगी शून्य में प्रवेश करता है तो ब्रह्माण्ड की विद्युत-चुंबकीय तरंगों में संग्रहित विचारों को अपने विवेकानुसार धरती पर ले आता है। संत अनोप दास कहते है कि आज्ञा चक्र में भट्टी जलाकर सूक्ष्म-विचारों का पेय तैयार किया जाता है, जिसे पीकर हमारा मनुष्य जन्म सुधारा जा सकता है। कवि आनंद आज्ञा चक्र की इस भट्टी को हिरण्य-गर्भ कहते हैं, जहाँ विचार जन्म लेते है और भाव-प्रवणता की चरम अवस्था में वे परम-शून्य के साथ जुड़ जाते है और परम-शून्य के विचारों को इस धरती पर ले आते हैं। ओडिशा में पल्लवित महिमा धर्म भी इस बात की पुष्टि करता है। शायद यही वजह रही होगी कि ‘अथर्वा’ से मुझे महिमा धर्म के प्रमुख प्रवक्ता अंधे संत कवि भीम भोई की औपन्यासिक शैली में आत्मकथा लिखने की प्रेरणा मिली ।
कुंडलिनी शक्ति के जागरण के कारण दोनों कवि और आलोचक, यूं कहे गुरू और शिष्य या कहें अथर्वा और दीर्घतमा- अर्द्धनारीश्वर के गूढार्थ को समझ जाते है। जिसका अर्थ आदमी और औरत के दैहिक संबंध से नहीं है, बल्कि आत्मिक एकाकार है। मगर ओशो रजनीश अर्द्धनारीश्वर को संभोग से समाधि का प्रतीक मानते है। पहले दैहिक संबंध, फिर इससे उभरकर आत्मिक संबंध। मगर क्या यह संभव है? संबंध दैहिक हो और साथ ही साथ आत्मिक भी? या केवल आत्मिक? कवि आनंद अपनी कविता में ओशो का समर्थन नहीं करते है। कुंडलवन की चौथी कविता ‘एकानंशा’ में दीर्घतमा को ईश्वर प्राप्ति होती है, देवी के दर्शन होते हैं और वह ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु में ईश्वर की उपस्थिति अनुभव करता है। अपनी कविता ‘सच्चिदानंद’ में अन्नमय, ज्ञानमय, विज्ञानमय कोषों से ऊपर उठकर कवि दीर्घतमा को आनंदमय कोष की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। दीर्घतमा का चित्त हमेशा आनंद के सागर में हिलोरे खाने लगा। सच्चिदानंद की स्थिति कैसी होती है, उसके बारे में कवि आनंद कहते है, “वहाँ अनंत देश है, अंतहीन काल है, अनंत उर्जा है, अनंत गति है, वहाँ दिशाएं फैलती -सिकुड़ती नहीं है, वह कल्पनातीत जगह है।”
इस अध्याय की अंतिम कविता ‘केवल मैं’ में जीव की आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है जहाँ केवल शून्य की अनुभूति होती है। कवि के शब्दों में
मैं क्रोञ्च-मार्ग से
शरन्नील मानस का हंस विगत आगत
मैं स्वयं सिसृक्ष कामनावर्त के
महादान सा देश प्रणव
मैं रूद्र धुनष पर खिंचा
हिरणशर जय भारत। .......( अथर्वा, कुंडलवन, पृ.135 )

चौथी पांडुलिपि ‘ब्रह्मावर्त’है, जो आधुनिक भारत का पुरातन नाम है। पुष्कलावली में मिली संस्कृत-लिपि में लिखी चौथी पांडुलिपि में ‘सुमेरूगिरि, ‘भारतवर्ष, ‘उद्विकास, ‘सप्तचक्र, ‘सारस्वत’और ‘उत्खनन’जैसी कविताओं के माध्यम से कवि ने भारत में विकसित सभ्यता के विभिन्न चरणों की व्याख्या की है। पहली कविता की शुरूआत होती है, सुमेरूगिरि से। यह पर्वत ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास स्थान है। यह पर्वत भारत वर्ष का मेरूदंड है, इसे देश का कुंडलवन भी मान सकते है। कवि देश की भौगोलिक स्थिति में एक साधक की कल्पना करते हैं। जिस प्रकार साधक की त्रिकुटि पर इडा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम होता है, वैसे ही सुमेरूगिरि भी आध्यात्मिक शक्तियों का केन्द्र-बिंदु है। भारत अजनाभ है, बिना नाभि के निकला हुआ, यही आर्यावर्त भी है। इस देश की कुंडलिनी जागृत है तभी तो अध्यात्म ज्ञान का यह भंडार है। दूसरी कविता का शीर्षक पारंपरिक है, ‘भारतवर्ष’। यह वही भारत है, जहाँ दस हजार साल पहले मेहरगढ (बलूचिस्तान) में विश्व की पहली सभ्यता पनपी थी। हमारे पूर्वज दिगंबर थे, पेड़ों की खोखल में प्रजनन करते थे, वृक्षों की छाल पहनते थे। धीरे-धीरे उन्होंने आग की खोज की, बर्तन बनाने शुरू किए, खेती का विकास हुआ। उस समय समाज में जातिवाद का कोई नामो-निशान नहीं था, सभी समभाव से रहते थे। कार्लमार्क्स सही कहता है कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि के अनुसार जातियों का निर्माण किया। आज भी हमारे देश में जातिवाद बड़ी भयंकर समस्या है। इस सभ्यता को विकसित होने में कितना संघर्ष हुआ होगा? आदमी की कल्पना से परे है। यह सत्य है कि एक सच्चा साधक हर चीज में साधना का दृष्टिकोण खोजता है। इस कथन का उल्लेख करते हुए प्रोफेसर गोरास्या अथर्वा की कविता ‘सप्तचक्र’की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं, जिसमें वह भारत की भौगोलिक संरचना में सातों चक्र मूलाधार (बीजाक्षर लं) स्वाधिष्ठान (बीजाक्षर वं), मणिपुर (बीजाक्षर रं), अनाहत (बीजाक्षर यं), विशुद्धि चक्र (बीजाक्षर हं), आज्ञाचक्र (दो बीज अक्षर हं तथा अं) और अंतिम सातवाँ चक्र सहस्रार की तुलना करते है और पाते हैं कि काश्मीर से कन्याकुमारी तक सातों चक्र विद्यमान है, जिसमें मूलाधार श्री लंका है और सहस्रार महाविद्या का केन्द्र-बिंदु काश्मीर है। पांचवी कविता का शीर्षक ‘सारस्वत’है। प्रो. गोरास्या सारस्वत का अर्थ आधुनिक शिक्षा से नहीं लेकर सरस्वती के किनारे बसे हुए लोगों की सभ्यता, भाषा, संस्कृति आदि से जोड़कर देखते हैं। इस पांडुलिपि की अंतिम कविता ‘उत्खनन’ है, जिसमें मोहनजोदड़ो हड़प्पा के उत्खनन के दौरान मिले साक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है कि हमारे पूर्वजों ने विशाल स्नानागार, ऊँचे-ऊँचे परकोटे, बड़े-बड़े खंभे, तराजू, बाट, आभूषण, तकली सूत, ऊनी वस्त्र, मिट्टी की पुतलियाँ, मोहर, माला के मनके आदि क्या कुछ नहीं बनाया, अपनी भावी संतति की सुख-सुविधाओं एवं सामाजिक समरसता पैदा करने के लिए ! कवि के अनुसार फिर कृतिका नक्षत्र उदय हो गया, अग्नि-तत्व के प्रभाव से लोगों का पित्त बढ़ गया,जातीय संघर्ष शुरू हो गए और अंत में यही विकसित सभ्यता तिरोहित होने के कगार पर जा पहुँची। पांचवी पांडुलिपि ‘स्त्रीसूक्त’ है। शुरू-शुरू में लगा कि क्या कवि आनंद और आलोचक गोरास्या जी ओशो रजनीश के अनुयायी तो नहीं है ? क्या वे संभोग से समाधि, काम से राम, सेक्स से सुपर कांशियस में विश्वास करते हैं? बुद्ध ने तो कहा था, भिक्षुणियों के बौद्ध-धर्म में प्रवेश की अनुमति मिलने के कारण यह धर्म चार सौ साल से ज्यादा चलने वाला नहीं है। फिर स्त्रियों की साधना में सहभागिता की वकालत करने वाले ‘स्त्रीसूक्त’ की यहाँ पर आवश्यकता? इस पांडुलिपि ने मुझे संत कवि भीम भोई की आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित किया था, जो स्वयं स्त्रियों को साधना का साधन नहीं, सहायक मानते हैं।
नारिवादी-स्वरों को मुखरित करने वाली पाँचवीं पांडुलिपि ‘स्त्रीसूक्त’ में ‘चक्षुराग’, ‘द्यावा-पृथिवी’, ‘सहचरण, ‘उद्वाह, ‘आत्मराग’ और ‘विश्वराग’जैसी दार्शनिक कविताएं हैं। इस पांडुलिपि की पहली कविता है ‘चक्षुराग’। आँखों ही आँखों में प्यार। अपाला को दीर्घतमा से प्यार हो जाता है। एक नायक को नायिका मिल जाती है, वह कहती है इस शरीर के भीतर कई शरीर शांति से सो रहे हैं। जब इनके भीतर पुराने संस्कारों के परमाणु प्रस्फुटित होने लगते हैं तो रूप-सौंदर्य के प्रति अपने आप अतृप्त ज्वाला भभकने लगती है। इस अदेह में देह के द्वार से ही ज्वाला का प्रवेश होगा। यह ज्वाला ही परमानंद का स्रोत है। ओशो रजनीश खुद स्वीकार करते हैं, जब घनायन ऋणायन से मिलते हैं तो उ वेल्डिंग के स्पार्क की तरह र्जा पैदा होती है। उस उर्जा को पहचानना ही परम सत्ता को पाना है। तभी अपाला कहती है,
देह है द्वार और देह है प्रवेशक
देह के चौखट में भरे हैं अदेह रूपांकन
देह में सोती है रूप की ज्वाला हल्की अंधेरी नीलाभ
साँवली किरणों से लिपटी। .......( अथर्वा, स्त्री-सूक्त, पृ.159 )

जहाँ कबीर की नजरों में नारी को नरक की खान है, जहाँ चाणक्य नारी को विष मानता है, वहाँ आचार्यद्वय आनंद और गोरास्या उस हलाहल को पीने की वकालत करते हैं। ऐसा क्यों? क्या अपाला दीर्घतमा को साधना पथ से विचलित करना चाहती है? या वह भैरवी बनकर दीर्घतमा की साधना को उर्ध्वगामी बनाना चाहती है ? यह प्रश्न केवल दीर्घतमा के लिए ही लागू नहीं होता है,वरन् समग्र मनुष्य समाज के लिए चुनौती है। क्या प्रेम या वासना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? क्या वे ‘sex is not complete without love’, ‘ love is incomplete without sex एवं ‘ sex and creativity go hand in hand’ वाली विचारधाराओं को मान्यता देते है? चक्षुराग से पनपा प्यार उनके जीवन को भटका तो नहीं देगा? इसी प्रश्न का उत्तर अथर्वा अपनी दूसरी कविता ‘द्यावा-पृथिवी’ में देते हैं, सूरज और पृथिवी के असीम प्यार का उदाहरण देकर। सूरज के चारों ओर पृथिवी चक्कर लगाती है, प्रेमाभिभूत होकर। सूर्य की रोशनी पृथिवी पर चराचर, जीव-जगत के जीवन संचालन हेतु प्रकाश-संश्लेषण क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सूरज के बिना पृथिवी जीवित रह सकती है? कदापि नहीं। ऐसा ही प्रेम आदमी और औरत के बीच होना चाहिए। भले ही, मेल-मुलाकात, शारीरिक स्पर्श न हो, मगर अपनी आत्मा का आशीर्वाद सदैव प्रेयसी पर बरसता रहना चाहिए। तीसरी कविता का शीर्षक है ‘सहचरण’ अर्थात् साहचर्य। बिना साहचर्य के क्या कभी कोई सृजन हुआ है? प्रेम कल्पना की उड़ान हेतु अनिवार्य वस्तु है, न कि वासना। चौथी कविता है ‘उद्वाह’। भले ही, कवि ने यहाँ उद्वाह का अर्थ बिना विवाह किए हुए एक-दूसरे के साथ रहने से लिया है, जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘अनामदास का पोथा’ में उद्वाह को देव-विवाह की श्रेणी में गिना है। उनके अनुसार उद्वाह आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रमुख शर्त है। इस उपन्यास मे जटिल मुनि रैक्व को उपदेश देते है कि उसे शुभा से विवाह नहीं, उद्वाह करना चाहिए, उसका पाणिग्रहण नहीं, उपोदग्रहण (मुख से) करना चाहिए। फिर पता नहीं, अथर्वा के कवि आनंद और आलोचक गोरास्या जी को उद्वाह शब्द में लिव-इन-रिलेशनशिप क्यों नजर आया? जहाँ कवि आधुनिक विवाह संस्था की कमजोरियों पर दृष्टिपात करते हैं, वहीं अपाला के स्वतंत्र नारीवादी विचारों की सराहना भी करते है। अपाला के विचार आधुनिक है, मगर भोगवादी न होकर आत्मिक स्वतंत्रता से संबंध रखते है। इसलिए श्वेतकेतु अपाला को विवाह के लिए प्रेरित करते हैं।
स्त्रीसूक्त की पांचवी कविता ‘आत्म-राग’ है, जिसके अनुसार वैवाहिक जीवन आत्म-अन्वेषण के लिए अपरिहार्य शर्त है। जिस तरह कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की यादों में सदैव खोया रहता है, वैसे ही साधक को भी अपनी आत्म-राग में लीन होना चाहिए। यही आत्म-राग ईश्वर-प्राप्ति का प्रमुख साधन बनती है। अगली कड़ी में अंतिम कविता है ‘विश्व-राग’। इस कविता में दुनिया के अलग-अलग धर्मों के प्रतिनिधिगण है। ‘वसुधैव कुटुंबकं’ ही कविता की अंतर्वस्तु है। दीर्घतमा दीर्घ समय से दमित दल का प्रतिनिधि है तो अपाला स्त्री-वर्ग की। प्रोफेसर गोरास्या जी ने कवि की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी आलोचना के दौरान यहाँ एक तीर से दो शिकार किए हैं, वे भी दोनों एक साथ, दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श के ज्वलंत मुद्दे उठाकर। जैक दरिदा की ‘थ्योरी ऑफ डिकन्सट्रक्शन’ का सहारा लेते हुए वह प्रश्न करते है कि क्या परिधि के बिना किसी संरचना के केन्द्र की कल्पना की जा सकती है? नहीं। अगर संरचना को तोड़ दिया जाए तो छोटी-छोटी परिधियों के कई केन्द्र निकलकर हमारे सामने आ जाएंगें। परिधि पर रहने वाले लोगों से, चाहे वे स्त्री हो या दलित,उनकी आवाज अवश्य सुननी चाहिए। भगवान बुद्ध भी तो यही चाहते थे कि विकेन्द्रीकरण से ही मानव का विकास संभव है। विकेन्द्रीकरण मानवता के प्रति अगाध प्रेम की प्रथम सीढ़ी है। मानवता भी किसी एक देश की नहीं, पूरे विश्व की। यह भी सोचने वाली बात है कि कवि ने ‘स्त्री सूक्त’ में ‘विश्व-राग’ कविता को क्यों जोड़ा? गोरास्या जी सही कहते हैं कि जब तक विश्व की सारी सभ्यताएं स्त्रैण नहीं हो जाती, तब तक विश्व में प्रेम का उदय नही होगा, केवल हिंसा और युद्ध का हाहाकार मचा रहेगा। नारी की वर्तमान स्थिति पर अथर्वा की पंक्तियाँ हैः-
तुम नारी को जान ही कितना सके हो?
देवता को छोड़कर उसकी अपनी समग्रता में
उसे स्वयं को भी जानने का कितना अवसर दिया है। ...
( अथर्वा, स्त्री-सूक्त, पृ.186 )
अथर्वा की छठवीं पांडुलिपि ‘तन्त्रालोक’ है। कवि आनंद ने खुद तंत्र साधना की है, अघोर साधना की है, अतः उनके व्यक्तिगत अनुभव इस पांडुलिपि की कविताओं में आना स्वाभाविक है। पांडुलिपि का शीर्षक देखकर पहले-पहल मैंने सोचा कि हो सकता है इन कविताओं में पंचमकार (मांस, मद्य, मैथुन, मत्स्य, मुद्रा) वाली तंत्र-साधनाओं का उल्लेख मिलेगा, मगर ऐसा नहीं था। कवि ने तंत्रालोक की कविताओं में दीर्घतमा की चेतना को अलाऊदीन के जिन्न की तरह अपनी उड़न-खटोले जैसी चादर पर बैठाकर पूरे विश्व का दर्शन करवा दिया। तंत्र-साधना में चेतना को पिंड और ब्रह्मांड की अलग-अलग जगहों पर ले जाकर उनकी अनुभूतियों को मानस-पटल पर अंकित करने का अभ्यास करना पड़ता है। मैंने तो हठयोगियों को ‘मृत्यु योग’ की साधना करते हुए सुना है, जिसमें वे अपनी चेतना को अपने शरीर से बाहर ले जाकर देह को शव की तरह देखते है तथा उसकी अत्येंष्टि कर्म की हर गतिविधि की सूक्ष्म-घटनाओं का अवलोकन भी। कहते भी है ‘पाश बद्धो भवेत् जीव, पाश मुक्त सदाशिव’। तंत्र साधक दुनिया के हर पाश से मुक्त होना चाहते है। इस अध्याय की पहली कविता ‘इंद्रप्रस्थ’ है। जैसा कि नाम से विदीत है दीर्घतमा की चेतना पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ यानि दिल्ली पहुँचती है, गीत गाते हुए चलती है, दूसरे पल में ध्रुव तारे पर पहुँच जाती है, वहाँ से सप्तऋषियों के पास, फिर चेतना नीचे उतर आती है।फिर पुआलों के टीलों पर बच्चों के साथ खेलना, नीम के पेड़ पर झूलना, भारद्वाज ऋषि के गुरूकुल में पहुँचना, त्रिवेणी में डूबकी लगाना आदि काल्पनिक क्रियाओं की साक्षी बनती है। इन घटनाओं में न क्रमबद्धता है और न ही कोई कालक्रम। न अनुक्रम, न तालमेल। चेतना है, वायवीय है, स्वतंत्र रूप से बह रही है, मन की गति से।
दूसरी कविता है ‘निष्क्रमण’। दीर्घतमा की चेतना विश्व की चेतना में परिवर्तित हो जाती है। घूमती है यूनान की धरती पर, कभी युद्ध की तुरही बजाते, कभी दौलत खोजते,देखती है कभी यवन युवतियों को वाद्य-यंत्र बजाते , कभी दार्शनिक हेराक्लिटस की वाणी सुनती है, कभी सुकरात, कभी अपोलो, कभी मूसा से मिलती है तो कभी जोशुआ की क्रब में सो जाती है। इस पांडुलिपि की तीसरी कविता ‘इलहाम’ है अर्थात् आकाशवाणी, देववाणी अथवा आत्मिक दृष्टि। यहाँ वह चेतना रेगिस्तान में रूबी, खय्याम, सेनाई, जुबैद की आत्माओं से मिलती है, अंधेरे कुएं में चली जाती है, जहाँ हजरत डूबने से बचाते है। उसके बाद ईसा मसीह के सूली वाले स्थान पर भी पहुँचती है। कवि की कल्पना का दौर नहीं थमता है। चौथी कविता ‘कार्ष्णवेद’ में दीर्घतमा की मुक्त चेतना कृष्ण, शंकराचार्य, वेदव्यास, शूद्रक, वैशम्पायन तोता, मीरा, तुलसीदास सभी की आत्माओं का जायजा लेती है। पांचवी कविता ‘बीज मंत्र’ में दीर्घतमा अपने गुरू के द्वारा दिए बीजमंत्र की सहायता से भर्तहरि, निषाद कन्या, शेषनाग, गोपीचंद, गोरखनाथ, कबीर, वाल्मीकि, पदमावती, कालिदास, अशोक, समुद्र गुप्त आदि से मेल-मुलाकात करता है। इस कविता में रोंगटे खड़े करने वाले तांत्रिक अनुष्ठान का भी वर्णन है। धधकती आग में नग्न दीर्घतमा अपने खून से हवन करता है, आग की लपटों में सोम उबलकर कपाल के दीयों में जल रहा है, तारादेवी खप्पर में शराब डाल रही है। रक्तिम आँखों से वह अर्द्धनारीश्वर बन जाता है। कानों में विचित्र आवाज ....... सिर पर हजारों आँखें। द्वन्द द्वैत सब दूर। अद्वैत ही अद्वैत। छठी कविता का शीर्षक ‘पुनर्जन्म’। दीर्घतमा की चेतना अपने पूर्व जन्मों की टोह लेती है। आदिमानव, डायनासोर, शरभ, मछली, अमीबा, शैवाल, जल, आग, हवा, प्रकाश सब आँखों के सामने से गुजरते है। बैलगाड़ी, महात्मा बुद्ध, गौतम, गिरिव्रज, रामुपंत, बोधगया, सारनाथ, ऋषिपतन, मानसरोवर सभी दिखते हैं। इसका श्रेय वह अपाला को देता है। दीर्घतमा इस स्तर पर समझ जाता है कि यह महाक्रांति है, आध्यात्मिक क्रांति का सूत्रपात हुआ है उसके जीवन में। यह क्रांति ही मानवता को बचा पाएगी।
सातवीं पांडुलिपि ‘महाश्मशान’ में कवि साधना मार्ग से हटकर देश की राजनीति के बारे में सोचने लगता है। आखिर में साधना क्यों? देश के विकास के लिए। अगर साधक कवि केवल अमूर्त विषयों पर ही चिंतन-मनन करेगा तो देश की मूर्त समस्याओं का समाधान कौन करेगा? साधक कवि ही तो समाज का सच्चा मार्गदर्शक होता है। इसी कसौटी को ध्यान में रखते हुए कवि आनंद तांत्रिक शब्दावली वाली पांडुलिपि ‘महाश्मशान’में अपनी ‘राष्ट्रीय द्विखंडता’, ‘धुंध और अंधकार, ‘सामूहिक विस्मरण, ‘त्रासदी’और ‘भारत की आत्मकथा’ जैसी कविताओं का संचयन करते हैं। उन्होंने इन कविताओं में भारत-पाक विभाजन, महात्मा गाँधी की हत्या, गाँधी की नीतियों और सुभाषचंद्र बोस जैसे दिग्गज नेता को भूल जाना, आजाद हिंद फौज का निर्माण करने वाले राष्ट्रवादी नायक को हवाई दुर्घटना में मृत बताकर इतिहास के पन्नों में पीछे धकेल देना, प्रजातंत्र की जगह भीड़तंत्र का बोल-बाला होना, गरीब-अमीर में बढ़ती खाई आदि अनेक अंतर्वस्तुओं को समेटा है।
आठवीं पांडुलिपि ‘प्रतिनारायण’ है, जो नारायणी शक्ति को आगे नहीं आने देना चाहती है। देश के विकास को पीछे धकेलना चाहती है, सभ्यता के सौंदर्य को बर्बाद करना चाहती है। गरीब को गरीब रखना चाहती है। कवि का मुख्य उद्देश्य यही है कि प्रति नारायण शक्तियों को पहचाना जाए और उन्हें हमारे समाज में हावी हाने से रोका जाए।
‘लोपामुद्रा’ अथर्वा की नौंवीं पांडुलिपि है। डॉ. गोरास्या मानते हैं कि तक्षशिला में यह पांडुलिपि ह्वेनसांग को नहीं मिली थी, इसलिए इसका नामकरण लोप हुई पांडुलिपि अर्थात् लोपामुद्रा रखा गया, मगर लोपमुद्रा पर मिथकीय कहानी भी है। वह अगस्तमुनि की पत्नी थी। इन्हें त्रिपुर सुंदरी कहते है और त्रिपुर भैरवी भी। कंकड-पत्थर से सोना बनाने की विद्या का उल्लेख होने के कारण कोलंबस इस पांडुलिपि की तरफ आकर्षित हुआ था। इसकी पहली कविता है ‘परिभव’ अर्थात् अपमान, अनादर तिरस्कार। परिभव के कारण दुख जन्म लेता है और दुख की अनुभूति से प्रकट होने वाले प्रकाश के कारण सर्जन होता है। कवि आनंद खुद कहते हैं :-
दुख ही छंद है सृजन का
गति है मानस के उर्ध्वचरण की
एकांत दुख की पदार्थमयी तृष्णा
तोड़ती है सपनों के जाल को
कि महाविस्फोट की तरंगे ग्रस लें पकड़ लें
स्नायु-तंत्र को फाड़कर जकड़ लें
और सृष्टि का प्रयोजन पूर्ण हो .......( अथर्वा, लोपामुद्रा, पृ.264 )

यहाँ प्रो. गोरास्या आनंद के उपरोक्त दर्शन की अरविंद के सावित्री महाकाव्य से तुलना करते हैं, जिसमें दुख को अंतदृष्टि विकसित करने का माध्यम माना गया है। दूसरी कविता ‘सच्चिद्वेदना’ है। वेदना देवी है, माता है। जो छुपी रहती है, इसलिए लोपामुद्रा है। दुख आगमन के समय तीन रूपों में प्रकट होती है - शक्ति, ऐश्वर्य और ज्ञान अर्थात् महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती। दुख के बगैर सच्चिदानंद की प्राप्ति असंभव है, इसलिए मनुष्य के मन में पीड़ा को संचित होना अनिवार्य है।
तीसरी कविता ‘महात्रिपुर सुंदरी’ है, जिसमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का वर्णन है। प्रो. गोरास्या इन तीनों की तुलना अरविंद के सावित्री महाकाव्य की तीन देवियों मेडोना ऑफ सफरिंग, मेडोना ऑफ माइट तथा मेडोना ऑफ लाइट से करते है। महाकाली मानव का अहंकार तोड़ने वाली, महालक्ष्मी धन और वैभव की देवी तथा महासरस्वती ज्ञान और सृजन की देवी है। ये तीनों प्रकृति की त्रिगुणात्मक शक्ति भी हैं अर्थात् सत्, रज और तम और तीनों देवियाँ मिलकर ‘ईश्वर महीयसी’ को जन्म देती है, जिस पर कवि आनंद ने इस पांडुलिपि में चौथी कविता लिखी। इन तीनों देवियों के मनुष्य मन में असंतुलन से दुख पैदा होता है। साधक इन तीनों देवियों के बीच संतुलन स्थापित करता है ताकि मानव समाज में किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। अंत में, पाँचवी कविता ‘लोपामुद्रा’’ में कवि लोपामुद्रा को दुख की देवी मानते हैं, जो संदेश देती है कि आत्म-ज्योति मानव के अभेद किले में रहस्यमयी तरीके से छिपी होकर संरक्षित है, जिसे पाना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।
‘समुद्रकल्प’ अथर्वा की ग्यारहवीं पांडुलिपि है, जिसमें प्रोफेसर आनंद की चार कविताएं ‘धर्मचक्र, ‘प्रार्थना का समय, ‘प्रेम कविताएं’और ‘तालिबान’ संग्रहित है। इस पांडुलिपि का नाम ‘समुद्र कल्प’ क्यों रखा गया? इस बारे में प्रो. गारास्या जी कवि के मंतव्य का संदर्भ देते हुए स्पष्ट करते है कि आधुनिक धर्मों में असहिष्णुता और असंख्य विद्रूपताएं पनप चुकी है, जो आने वाली पीढ़ी को सही रास्ता दिखाने में सहयोगी नहीं होगी। आधुनिक समय में एक ऐसे धर्म की जरूरत हैं, जो समुद्र की तरह विशाल हो और जिसमें अलग-अलग धर्म की, अलग-अलग विचारधाराओं की, अलग-अलग परंपराओं की सारी नदियाँ समा जाती हो, फिर भी यह समुद्र अपूरित रहता है और जिसका सारा जल बौद्ध की करूणा-प्रेम से भरा हो। इस्लाम के कट्टरपंथी धर्म के नाम पर बौद्ध की प्रतिमाएं तोड़ते हो, हिंसा करते हो, आतंक फैलाते हो, ईसाई मिशनरियाँ चालाकी से धर्मांतरण करती हो, हिंदु धर्म में जातिवादिता जैसे भयंकर कुरीतियाँ हो - ऐसी अवस्था में सभी धर्मों को समुद्र में डूब कर मर जाना चाहिए और नए समुद्र मंथन के बाद करूणा, प्रेम मानवता से भरी बौद्ध-चेतना वाला धर्म पैदा होकर आने वाली सभ्यता का मार्गदर्शन करें।
पहली कविता ‘धर्म चक्र’ में बुद्ध निराश है, कट्टरपंथी तत्वों द्वारा मानव जाति को विनष्ट होते हुए देखकर। बुद्ध संदेश देते है, मेरी मूर्तियों को भले ही, तोड़ो मगर उन कारीगरों का सम्मान करो, जिन्होंने उन्हें बनाया हैं। मूर्तियों को तोड़ने से क्या मिलेगा? तोड़ना है तो अपना अहंकार तोड़ो। दूसरी कविता ‘प्रार्थना के समय’ में कवि धर्म के झूठे आवरणों से पर्दा हटता है। धर्म किसी विशेष समुदाय को बाँधने के लिए नहीं, नर्क की कल्पना से भय आतंक फैलाने के लिए नहीं, लाउडस्पीकरों से चिल्ला-चिल्लाकर प्रार्थना करने के लिए नहीं है। धर्म बाबाओं के हाथ की कठपुतली भी नहीं है। धर्म मानव को प्रकृति से लयबद्ध होना सीखाता है। प्रोफेसर गोरास्या के अनुसार अंग्रेजी कवि वर्ड्सवर्थ की कविता ‘टिटर्न अबि’ में जिस तरह कवि की आत्मा शरीर से बाहर निकलकर प्रकृति से एकाकार हो जाती है – वैसा एकाकार होना ही धर्म सीखाता है। मानव के केन्द्र में प्रकृति की चेतना का वास है, अतः उसे उसकी विस्मृत महाचेतना को खोजना ही धर्म है। धर्म की नई व्याख्या के बाद कवि ‘प्रेम कविताएँ’ शीर्षक में इस्लाम से सूफी- पंथ के प्रतिबंधित होने पर दुख प्रकट करता है। कभी यही सूफी पंथ ईश्वरीय प्रेम कविताओं के सर्जक हुआ करते थे। सूरदास के तानपुरे को नि:शब्द देखकर उसका मन कोह से भर जाता हे। कवि मानता है, जब-जब प्रेम की सत्ता पर चुनौती आयी है, तब-तब प्रेम पुनः ताकतवर बनकर उभरा है। इस पांडुलिपि की अंतिम कविता ‘तालिबान’ में इस बात की संकेत किया गया है कि जब-जब तालिबानी शक्तियाँ बढ़ी है, तब-तब शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोला है। दुनिया की समरसता और शांति के लिए अगर जरूरत है तो वर्तमान के जड़ीभूत धर्मों को बदलकर- समुद्र की तरह विशाल व्यापकता लिए हुए धर्म की, जिसमें हिंसा, अहंकार, छूआछूत, जातिवाद, अंधविश्वास, रूढ़िवाद और अज्ञानता का नामोनिशान नहीं हो।
बरहवीं पांडुलिपि ‘पृथिवी सूक्त’ में कवि ने पृथिवी की सुरक्षा संबंधित कविताओं के माध्यम से मानव और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। आज अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है, पूंजीवाद पनप रहा है, उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, हमारी मानव सभ्यता और संस्कृति का अधोपतन हो रहा है। विदित है,हमारी पृथ्वी लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है, मगर उनके लोभ-लालच की नहीं। जरा सोचिए, सारे प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होने के बाद क्या होगा? हमारी आने वाली पीढ़ी कैसे जी पाएगी? हम आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगें? ऐसे भी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कौन कर रहे हैं? पैसे वाले लोग? हाँ, इस वजह से समाज में गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। एक साधक कवि का नैतिक दायित्व होता है कि वह अपने आत्मोत्थान के साथ-साथ संपूर्ण विश्व की समस्याओं के बारे में भी सोचें । क्या एक साधक कवि मार्क्सवादी विचार धारा से प्रेरित नहीं हो सकता है? ‘अथर्वा’का दीर्घतमा दबे-कुचले-दमित-वंचित श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधि है, वह डॉ. अंबेडकर है और अथर्वा स्वयं मार्क्स की तरह क्रांति के लिए प्रेरित करता है, मगर बंदूक की नोक से निकलने वाली मार्क्स क्रांति के लिए नहीं, बल्कि कवि आनंद की आत्म-शोधन वाली क्रांति के लिए। अगर हर व्यक्ति अतिमानस स्तरीय चेतना प्राप्त कर लेता है तो समाज की सारी समस्याएँ अपने आप समाप्त हो जाएगी। कवि के मन में ये विचार कहाँ से पैदा हुए? प्रोफेसर गोरास्या उत्तर देते हैं कवि ने अपने बचपन में अपने पिताजी की समाजवादी प्रवृत्ति के कारण अपने घर पर सवर्ण और दलितों को एक ही मंच पर देखा है। अतः बचपन के संस्कार आजीवन बने रहते हैं और सर्जन के अलग-अलग रूपों में प्रकट होते है।
कवि आनंद और प्रोफेसर गोरास्या दोनों बुद्ध से ज्यादा प्रभावित नजर आते हैं। ऐसे भी बुद्ध के दरबार में सभी के लिए दरवाजे खुले थे। वहाँ अवर्ण, सवर्ण कुछ नहीं होता है। विवेकानंद भी कहते थे कि एक भूखे को गीता के श्लोक सुनाने से क्या फायदा? क्या गीता के श्लोक उसके पेट की भूख को मिटा पाएंगें? आध्यात्मिकता तभी अच्छी लगती है, जब घर में दाल-चावल मिलते हो। यही दर्शाने के लिए कवि ‘पृथिवी सूक्त’ पांडुलिपि की पहली कविता ‘प्रार्थनाः दलित द्राक्षा’ लिखी, जिसमें उन्होंने भारत की सारी कौमों के महाजागरण हेतु प्रार्थना करते हैं। सभी मनुष्यों में ईश्वर का अंश देखते हैं। दूसरी कविता ‘माता भूमिः’ में दीर्घतमा का स्वगत कथन है। धरती ही तो सबकी माता है, सबको समानता से पोषित करती है, मगर मानव की कुटिल बुद्धि ऐसा होने नहीं देती है। उच्च जाति के लोग कभी नहीं चाहेंगे कि दूसरा कोई उनकी बराबरी करें। तीसरी कविता ‘स्वप्नालाप’ में दीर्घतमा गरीबों पर हो रहे अत्याचारों को देखकर बड़बड़ाता है, जबकि चौथी कविता ‘रौरव छल’ में वह दुनिया में व्याप्त छल कपट को देखता है। जहाँ-जहाँ उसकी नजर जाती है, वहाँ-वहाँ उसे छल ही छल नजर आता है। परिवार में छल-कपट, समाज मे छल-कपट, राजनीति में छल-कपट। जाएं तो जाएं कहाँ? पांचवीं कविता ‘कुंभीपाक’ में दीर्घतमा सपने में नरक-लोक का वीभत्स दृश्य देखता है। नरक वास्तव में गरीबी और बीमारी से जूझने वाली जनता की दुरावस्था ही तो है। न खाने को अन्न, न सोने को छत और न पहनने को वस्त्र। छठीं कविता ‘महाकाल का शाप’ में कवि ने अचेतनावस्था में भी मानव को अपने कर्मों से अंतर्संघर्ष करते हुए मौत के मुँह में समाते हुए देखा है। यही कारण है पृथिवी आज दुर्दिनों से गुजर रही है। चारों तरफ हाहाकार है, आग ही आग है।
पृथिवी की यह अवस्था देखकर कवि अपनी सातवीं कविता ‘आदीप्त वनानल’ में शब्दों को जलते हुए देखता है। यह देखकर दीर्घतमा नि:शब्द हो जाता है और अपनी आत्मानुभूति में इस संसार के जीव-जंतुओं को त्रय ताप में दग्ध होते देखता है। क्या पृथवी? क्या मानव? क्या परिवेश? क्या प्रकृति? सब-कुछ स्वाहा। अन्याय, शोषण, असमानता और वर्ण विभेद की अग्नि-विभीषिका में सब जल रहे हैं, दमितों की आवाज भी। इस समस्या का कैसे समाधान पाया जाए? इसी कथानक पर कवि की अंतिम कविता ‘महाक्रांति’ की रचना होती है कि उपरोक्त समस्याओं से निदान पाने के लिए वर्तमान समय में महाविप्लव की आवश्यकता है। यह विप्लव अस्त्रों-शस्त्रों वाला नहीं बंदूक की गोली वाला नहीं, लोगों की हत्या या हिंसा से नहीं। यह क्रांति आत्म-क्रांति है, आत्म-परिवर्तन की क्रांति। केवल बाहरी परिवर्तन नहीं, आंतरिक रूपांतरण की क्रांति। चेतना की क्रांति, अनासक्त मनुष्य के जिजीविषा की क्रांति। यह क्रांति समष्टि के लिए होनी चाहिए, न कि व्यष्टि के लिए। ऐसी समेकित क्रांति रक्त-रंजित नहीं होती है, बल्कि चेतना के पल्लवन में हिलोरे खाने वाली होती है। चेतना का उत्थान कैसे होगा, हर मनुष्य में? इसका जवाब कवि अपनी अगली पांडुलिपि ‘अतिमानस’ में देते है। ‘अतिमानस’ अथर्वा महाकाव्य की तेरहवीं पांडुलिपि है। अतिमानस होता क्या है? आध्यत्मिकता से मनुष्य अतिमानस की ओर जाता है या भौतिकवाद से? क्या अतिमानस के लिए इन दोनों में पारस्परिक तालमेल और पूर्ण सामंजस्य होना चाहिए? यह सामंजस्य होगा भी तो कैसे होगा? साधना से या क्रांति से? शिक्षा से या अभ्यास से?
दीर्घतमा की बहुत सारी शंकाओं का समाधान कवि ‘अथर्वा’ इस पांडुलिपि में करते है। अतिमानस दर्शन एक उच्च स्तर की चेतना है, जहाँ से सारे प्राणी समान नजर आते हैं, किसी में कोई भेदभाव नहीं, न धर्म का, न जाति का, न व्यवसाय या कर्म का, न रूप-रंग, नस्ल-भेद का। जब कोई मनुष्य अपनी साधना के बल पर उस स्तर तक पहुँच जाता है तो उसे जगत के हर अंश में परमात्मा के दर्शन होते है, चाहे वह पदार्थ निर्जीव हो, चाहे सजीव हो। अरविंद ने इस दर्शन को समझाने के लिए दो त्रिभुजों का सहारा लिया, एक सीधा त्रिभुज तो दूसरा उस पर अध्यारोपित होता उलटा त्रिभुज। सीधा त्रिभुज दर्शाता है साधक की चेतना का ऊर्ध्वगामी होना और उस पर लगा हुआ उलटा त्रिभुज दर्शाता है ‘अतिमानस’ से नीचे आने वाली अनुकंपा। ज्यों-ज्यों साधक की चेतना का स्तर उर्ध्वगामी होता जाता है, त्यों-त्यों ‘अतिमानस’ से ईश्वरीय अनुकंपा निम्नगामी होकर उस पर बरसती जाती है। अतिमानस पर किसी तोते की तरह रटी-रटाई टिप्पणी करना गलत है, बल्कि अतिमानस को अनुभव करने के लिए प्रयास करना ज्यादा जरूरी है। यह भी सत्य है कि करूणा भाव के बिना अतिमानस की कल्पना व्यर्थ है। मार्क्स ठीक ही कहता है, विश्व के सभी प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का बराबर-बराबर हक होता है, मगर चतुर बुद्धि वालों ने उनका दोहन कर अपने आपको विकसित कर लिया और दूसरों के हक को मारकर उन्हें दलित-दमित बना दिया। यह चतुराई आज से नहीं, सृष्टि के उद्भव के समय से चलती आ रही है।सभी को अपने संसाधनों का बराबर-बराबर हिस्सा तभी मिले सकेगा, जब वे अतिमानस द्वारा प्राप्तआध्यत्मिक ज्ञान को आत्म-सात कर लेंगे। कवि इसके पक्षधर है। अरविंद की तरह वह खुद चाहते हैं कि हर मनुष्य में पचास फीसदी भौतिकता हो तो पचास फीसदी आध्यात्मिकता भी अपरिहार्य है, उसके सर्वांगीण विकास के लिए यह संतुलन अत्यावश्यक है। कवि आनंद ने बड़ी कुशलता से अतिमानस विमर्श के लिए विश्व के कोने-कोने से महान पुरूषों को एक मंच पर इकट्ठा किया है, ताकि वे विश्व की समग्र समस्याओं का समाधान करने के लिए अपने-अपने सुझाव दे सकें। इसलिए कवि ने अपनी पहली कविता ‘दीर्घतमा’ पर ही लिखी है। यद्यपि दीर्घतमा अथर्वा के संपर्क में है, मगर उसके भीतर का अन्तर्द्वन्द खत्म नहीं हुआ। वह कहता है,एक तरफ हम आजादी की बात करते हैं तो दुनिया जीने नहीं देती। भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं, मगर भीतर-भीतर ही भ्रष्टाचार करते जाते हैं। संसार में भूमंडलीकरण की भीड़ है। लोग मुखौटा पहनते हैं। हाथी के दाँत दिखाने के अलग, खाने के अलग। नकली चेहरे और मलीन आत्माओं की भरमार है। चारों ओर विकृतियाँ ही विकृतियाँ, विद्रूपताएं ही विद्रूपताएं, अंधकार ही अंधकार। उसकी एक ही इच्छा है कि पृथिवी वासियों की चेतना का विस्तार हो, ताकि सारी समस्याओं का निदान स्वतः हो जाए।
इस पांडुलिपि की दूसरी कविता ‘अब्राहम’ है, वह ईसाईयों का प्रतिनिधि पैगंबर है। कवि उसके माध्यम से ईसाई धर्म के विचारों से दुनिया में परिवर्तन लाने की सोचता है। ईसाई धर्म का मूल तत्व करूणा है, फिर भी जब वह संसार में लोगों को भूख से बिलखते देखता है, उनकी हत्याएं देखता है तो उसका मन करूणा से भर उठता है और वह भी अतिमानस की ओर ताक लगाकर बैठता है कि कब वह जागे और कब दुनिया में सुख, शांति और समृद्धि की स्थापना हो।
तीसरी कविता ‘सनत्कुमार’ है। ब्रह्मा के मानस पुत्र । अतिमानस तो उनके रग-रग में बसा हुआ है। सनत्कुमार कोई और नहीं, हमारे मन के विचार है, अच्छे-बुरे सभी। बुरे विचारों को बदलकर अच्छे विचारों की ओर गमन करना ही अतिमानस का अवतरण है। उत्तर आधुनिक युग में पृथिवी की दुर्दशा को थामने के लिए हमारे पास अतिमानस के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।
अगली चौथी कविता, शीर्षक ‘अपाला’। वह अथर्वा की मानस पुत्री और दीर्घतमा की पत्नी है। नारी चेतना की प्रतीक है। कहती है, इतिहास कोई खेल या लोगों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों की वैचारिक लड़ाई और बलिदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने वाला दस्तावेज है। आधुनिक पीढी इतिहास से दूर भागना चाहती है, वह सही नहीं है। अपाला हमारी पीढी को वेदों की ओर लौटने का संदेश देती है,ताकि भौतिकता और आध्यात्मिकता में संतुलन पैदा हो। आज की शिक्षा-प्रणाली में आध्यात्मिकता शून्य है, सर्वत्र केवल भौतिकता ही भौतिकता पसरी हुई है, जिसका परिणाम यह है कि हमारी पीढी पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर उपभोक्तावादी बनती जा रही है और तरह-तरह की शारीरिक-मानसिक व्याधियों का शिकार भी।
प्रोफेसर आनंद इस्लाम धर्म का प्रतिनिधित्व हेतु अपनी पांचवी कविता ‘अलमुस्तफा’ की रचना करते हैं। अलमुस्तफा के मन में इस्लाम के प्रति आदर है, वह कहता है भारत में व्याप्त ऊँच-नीच, जातिवाद, शोषण, उत्पीड़न का अंत केवल इस्लाम के द्वारा ही संभव है। इस्लाम में भेदभाव नहीं है, भाईचारा है, साम्यवाद है। अलमुस्तफा नीत्शे के सुपरमैन और विश्वामित्र के महामानव संबंधी विचार को इस धरती पर लागू करने के लिए इस्लामिक विचारों को उचित मानते हैं क्योंकि इस्लाम ने हिंसा के बल पर मानव के बीच बराबरी स्थापित की है। इस पांडुलिपि की अंतिम छठी कविता ‘मार्कंडेय’ है। मार्कंडेय महाभारत का ऋषि, भारतीय चेतना का प्रतीक। उनके अनुसार जब दुनिया नहीं बनी थी, अंधकार ही अंधकार था। केवल एक स्पंदन से अनाम विचार पैदा हुआ। विचार भी सोया हुआ, अंधेरे में। इच्छा हुई कैसे अभिव्यक्त हो? भाषा की असीमित पहुँच सावित्री के कालरात्रि में प्रवेश कर अंधेरे के पर्दे को हटाने के तुल्य है। मार्कंडेय ‘अतिमानस’के ज्ञाता है, विशेषज्ञ है, अरविंद के प्रतीक है। कहते हैं भारत में चेतना को सबसे पहले अनभिव्यक्त पदार्थ के रूप में माना गया। यह दूसरी बात है, वेद नेति-नेति कहकर छुटकारा पा लेता है। इस देश के पास आत्मा के ताले की कुंजी थी, फिर भी गुलाम हो गया! आज आजाद है, मगर मायाजाल में फंसा हुआ। कवि आनंद ऋषि मार्कंडेय के मुख से कहलवाते हैं कि पदार्थ शरीर के समस्त परमाणुओं में आत्म-ज्योति की चिंगारी है, जलाने वाला चाहिए। जब तक नहीं जलाएंगे, अंधेरे में जन्मों-जन्मों तक भटकते रहेंगे। अतिमानस का कदापि यह अर्थ न समझा जाए कि वह स्पाइडर मैंन, आयरन मैन, हल्क की तरह सुपरमैन है या भीम की तरह बलशाली है या हनुमान की तरह बुद्धिमान है। अतिमानव मानव से केवल एक सीढी ऊपर है, वह है आत्म-ज्ञान की। सामूहिक तौर पर हमें आत्मज्ञान पाना चाहिए, न कि ब्रह्मांड के संसाधनों को समूल नष्टकर सामूहिक आत्म- हत्या हेतु प्रेरित करना। अतिमानस तभी धरती पर उतरेगा, जब हम सभी उसे नीचे लाने का प्रयास करेंगे, वह भी एक साथ, अंधेरे से उजाले की ओर गमन कर। इस प्रकार अरविंद की ‘सावित्री’ पर पीएचडी करने वाले प्रोफेसर गोरास्या के लिए अतिमानस दर्शन अत्यंत ही प्रभावी और सूक्ष्म था, इस वजह से कवि आनंद का ‘अथर्वा’ की इस पांडुलिपि पर उनकी पकड़ सबसे ज्यादा थी। कवि की अंतरात्मा का सहयात्री बनकर वे सभी धर्मावलम्बियों को यह संदेश देने में सफल हुए कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य चेतना के स्तर को अतिमानवीय बनाए बिना मनुष्य अपनी समस्याओं से कभी भी छुटकारा नहीं पा सकता है। इस विचारधारा को विश्व-पटल पर लाने के लिए दोनों कवि आनंद और उनके साहित्यिक आलोचक मित्र प्रोफेसर गोरास्या धन्यवाद के पात्र है।
प्रोफेसर आनंद की अथर्वा में चौदहवीं पांडुलिपि ‘जंबूद्वीप’ की है। जंबू द्वीप, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त की तरह भारत का ही पुराना नाम है। ‘ब्रह्मावर्त’ चौथी पांडुलिपि थी, उसमें कवि ने भारत के अतीत गौरव पर प्रकाश डाला है और ‘जंबूद्वीप’ पांडुलिपि में एक से तेरह तक की सारी पांडुलिपियों का सारांश प्रस्तुत किया है। इस अध्याय की पहली कविता है ‘आरोहण’ अर्थात् आत्मा का उर्ध्वगामी होना। आज मनुष्य इंद्रिय-सुख के पीछे भागता है, जबकि जरूरत अति एन्द्रिक सुख पाने की। जब मनुष्य की आत्मा अपनी उत्कर्ष चेतना के शिखर तुंग पर पहुँच जाती है तो दुख-दर्द का अंधेरा अपने आप मिट जाता है। सत्यान्वेषी साधक समर्पण भाव से अपने तल घर में कुंडली मारे बैठे साँप को चेतना के रहस्यमयी तलों में प्राणमय लोक, भूत लोक, पितृ लोक, सूक्ष्म जीव लोक से होते हुए तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है, वहाँ उसके पिछले कर्मों का क्षय होता है और प्रेम का असली स्वरूप सामने आता है। इससे भी आगे एक लोक है, जिसे तुरीयातीत लोक कहते हैं वहाँ केवल शुद्धात्मा ही पहुँच पाती है और अंत में सातवाँ दिव्यलोक है, जहाँ ब्रह्मांडीय चेतना का निवास होता है। ‘आरोहण’ कविता इन सात पादानों पर चढ़ने की कविता है।
यौगिक शब्दावली में इन सात लोकों का नामकरण भुः, भुवः, स्वः, जन, मह, तप और सत्यम् हैं। दूसरे शब्दों में, पातंजलि का हठयोग, अरविंद की अतिमानस साधना अथवा आनंद की आरोहण कविता - सभी आत्मा को उर्ध्वगामी बनाने पर बल देते हैं। सत्यम् लोक यानि तुरीयातीत लोक में आत्मा का आरोहण होने के बाद चेतना जागृति के उच्चतम स्तर पर होती है, जिसे अतिमानस कहते हैं, वहाँ अज्ञान रूपी अंधेरा खत्म हो जाता है। महिमा धर्म इस अवस्था को परम शून्य या ठूल शून्य कहता है। वर्तमान परिस्थितियों में आरोहण ही सारी समस्याओं को जड़ से नष्ट करने का एक मात्र साधन है। इस पांडुलिपि की दूसरी कविता ‘उत्तर पथ’ है। उत्तर-पथ भी एक लोक का नाम है अतिमानस से ऊपर, जहाँ प्रजापति की चेतना रहती है। यहाँ तक पहुँचना साधक की सर्वोच्च अवस्था है। इसी कविता में कवि कहते है, कला केवल कला के नहीं होती है, वह ईश्वर प्राप्ति का एक साधन भी है। कलाकार अपने सृजन बल से सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर ब्रह्मलोक की उर्जा को अपने भीतर खींच लाता है। इसलिए कवि को भी ब्रह्म कहा जाता है, क्योंकि अगोचर की अनुभूति ही उसकी कला में झलकती है, अन्यथा इस अनुभूति से रहित कवि केवल संसार पर ही केंद्रित रहते है। उदाहरण के तौर पर, नृत्य कला को केवल शरीरिक व्यायाम नहीं समझना चाहिए, यह तो कलाकार की भावावेग से परम शून्य की यात्रा है, जहाँ प्रकृति का प्रत्येक अणु ओंकार ध्वनि के साथ नटराज की तरह नृत्य करता है। दुनिया की हर कला में आध्यात्मिकता है। प्रोफेसर गोरास्या कवि आनंद के इस कथन का समर्थन करते है कि कला का उद्देश्य ब्रह्म प्राप्ति होना चाहिए। उनके दृष्टिकोण में प्लेटो का कथन - कला नकल होती है - पूरी तरह गलत सिद्ध होता है। यही नहीं, अरस्तू का कथन - कला एक पुर्नसर्जन होती है - भी शत-प्रतिशत सही नहीं है। कवि के शब्दों में, कला ईश्वर प्राप्ति का एक माध्यम होती है, हर दृष्टिकोण से पूरी तरह सही है। कवि इस कविता में विज्ञान और अध्यात्म को मिलाकर देखते है। आज विज्ञान ईश्वर कणिका (गॉड पार्टिकल) की खोज में लगा हुआ है, मगर आत्मशांति के लिए अन्वेषण में क्यों नहीं? संप्रति आत्मशांति ईश्वर कणिका की खोज के तुलना में ज्यादा जरूरी है। इस प्रकार कवि की ‘आरोहण’ और ‘उत्तरपथ’ कविताओं में पूर्व की सारी पांडुलिपियों मे जैसे ब्रह्मवर्त, स्त्रीसूक्त, अतिमानस, हिरण्यगर्भ, पृथिवी सूक्त और लोपामुद्रा की वैचारिक दार्शनिक झलक स्पष्ट होती है। अप्रत्यक्षतः पूर्व पांडुलिपियों का विस्तार है ‘जंबूद्वीप’। यहां दीर्घतमा अब केवल दलितों का प्रतिनिधि अंबेडकर नहीं है वह तो अखिल मानव जाति का प्रतिनिधित्व कर रहा है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के पथ पर अग्रसर होकर। यहाँ कवि दीर्घतमा और अपाला के संबंध को लिविंग कहते है, न कि लिव इन रिलेशनशिप। अगर दीर्घतमा देह है, तो अपाला उसकी आत्मा। यह अरविंद के ‘सावित्री’ महाकाव्य में सत्यवान केवल शरीर है और सावित्री उसकी आत्मा। शरीर और आत्मा का मिलन ही विवाह है। इस खंड की तीसरी कविता ‘अंतर्दाह’ में दीर्घतमा आत्मज्ञान के बल पर अपने भीतर सदियों से संचित हीन भावना को बाहर निकालने के लिए संकल्प-बद्ध है। मगर वह भीतर ही भीतर जलन महसूस करता है। जब अथर्वा उसे वाल्मीकि, व्यास और कबीर जैसे महात्माओं के उदाहरण देता है, जिन्होंने अपने आत्म- ज्ञान के बल पर जातिवाद की दीवारों को तोड़कर साफ-सुथरा समाज बनाने की कोशिश की थी तो दीर्घतमा भी उनके उत्थान हेतु आत्म-क्रांति का संकल्प लेता है। यहाँ दीर्घतमा अपने आपको अन्त्यज मानता है, किसी चमार की तरह गाँव के नि:संग कोने में रहने वाला। कवि का काव्यिक चित्रण अत्यंत ही सशक्त रूप से प्रतिबम्बित हुआ है, गोरास्या जी के अनुसार कवि ने अपने गांव सांगापाली में अन्त्यज समुदाय को नजदीकी से देखा है। वैदिक काल में कर्म के अनुसार जातियाँ बनी, मगर उत्तर वैदिक काल में जातियाँ जन्मगत हो गई। उसी समय से हमारी महान सभ्यता का नाश होना शुरू हो गया। विदेशी आक्रांताओं ने वेदपाठी ब्राहमणों की सामूहिक हत्या की, क्षत्रियों का पतन शुरू हुआ, वैश्यों और शूद्रों को भी जातिवाद के दुष्परिणामों का खामियाजा भुगतना पड़ा। हमारे देश की पारंपरिक स्मृति और श्रुति परंपराएं नष्ट होने लगी। आक्रांता गौरवशाली भारतीय संस्कृति का पतन चाहते थे। अरविंद आज आध्यात्मिक समाजवाद की बात करते हैं। उनका यह दर्शन उनके महाकाव्य ‘सावित्री’ और बहुचर्चित ग्रंथ ‘द लाइफ डिवाइन’में परिलक्षित होता है। अध्यात्म पर किसी एक जाति का कब्जा क्यों? यह तो सभी के लिए है। उत्तर वैदिक काल के ह्रास के बाद बुद्ध ने सभी के लिए दरवाजे खोल दिए। उसका भी दुष्परिणाम ही हुआ। विदेशी आक्रांताओं को देश पर धावा बोलने का मौका मिल गया और हमारा देश दासता की जंजीरों में जकड़ता चला गया। दीर्घतमा इसी अंतर्दाह से इस कविता में जलता हुआ नजर आता है। इस शृंखला में कवि की चौथी कविता है ‘उर्ध्वलोक’। इस कविता में ब्रह्मलोक के रहस्य है। कहाँ पृथिवी लोक! कहाँ ब्रहमलोक!! बिना वहाँ तक पहुँचे क्या कोई उन रहस्यों को उजागर कर सकता है? कवि ने साधना के बल पर अपने भीतर उस लोक का दर्शन किया है, तभी वे अपने अर्जित अनुभव पाठकों के सम्मुख रख रहे हैं। वह चेतना का वह तल है, जहाँ संप्रेषण के लिए शब्दों की जरूरत नहीं है। उनके शब्दों में, शब्दातीत है यह लोक! यहाँ कविताएं झरने की तरह अनवरत बहती है। सिद्ध ऋषि-मुनियों की आत्माओं की निवासस्थली है यह। इस तल को वाल्मीकि, वेदव्यास, तुलसीदास और विश्व के अन्य कालजयी रचनाकारों की आत्माओं ने स्पर्श किया था। यहाँ हमारे श्रेष्ठ पितर रहते हैं, जो सदैव मन में घनात्मक विचार प्रेषित करते हैं। यहाँ सभी सिद्ध और तीर्थंकर पवित्र और शांत दिखाई देते हैं। स्वर्णिम प्रकाश बिखरा हुआ है यहाँ पर। यहाँ से शुद्ध आत्माएं नीचे उतरकर धर्म की स्थापना कर फिर अपनी जगह चली जाती हैं। पृथिवी के पेड़ों के पत्ते भी यहाँ की इच्छा के बिना नहीं हिलते हैं। ‘ब्रह्मलोक’ के बाद कवि पांचवी कविता में ‘चिन्मय भारत’की व्याख्या करता है। भारत की भौगोलिक स्थिति, उसके पर्वत-नदी-तीर्थ का समवाय ही उसे चिन्मय बनाता है, मगर वैदिक काल के बाद यह चिंता अंधेरे में क्यों चली गई? कवि के शब्दों में, भारत एक विचार है ज्योति के अनुसंधान का, आत्मा की खोज का, यह भूखंड का टुकड़ा मात्र नहीं है। विश्व में कहीं पर भी ‘भारत’ पैदा हो सकता है। भारत ने ही ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ का नारा दिया था। यह आत्मानुसंधान का देश है, प्रकाश और ज्ञान की खोज का देश है। यह देश का दुर्भाग्य है कि पिछले हजार साल से अंधेरे कुएं में पड़ा हुआ है, जीर्ण-शीर्ण हो गया है। अगर फिर से यहाँ के निवासी आत्मानुसंधान मे लगेंगे तो देश की खोई गरिमा नि:संदेह लौट आएगी।
जंबूद्वीप पांडुलिपि की छठी कविता ‘इतिहास ग्रंथि’ है। प्रोफेसर गोरास्या का मानना है कि इतिहास केवल पूर्व घटनाओं का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि तत्कालीन समाज के सुप्त नयनों में तैरती मन की इच्छाओं का भी लेखा-जोखा है। अगर हम दो हजार साल पूर्व के अतीत में झाँकें तो पाएंगें कि किस तरह वैदिक संस्कृति, बौद्ध-धर्म की चेतना का उत्थान-पतन हुआ। बौद्ध धर्म ने तो विश्व को करूणा का संदेश दिया, फिर वह धर्म पतनोन्मुखी क्यों हो गया? इतिहास साक्षी है तत्कालीन राजाओं ने जनमानस के अवचेतन की अवहेलना की। यद्यपि बौद्ध धर्म को अशोक का संरक्षण मिला था, मगर बाद में राजा बाहुबली बनते गए, राष्ट्रकूट-गुर्जर-प्रतिहारों और चोलों मंर आपसी संघर्ष शुरू हो गया, अपनी जातीय श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए। बस, इस अवस्था में फूट पड़ने के कारण भारत बिखरने लगा और ऊपर से इस्लाम का आक्रमण । उनकी क्रूरता के सामने तत्कालीन राजाओं ने घुटने टेक दिए। क्षत्रियों की अस्मिता दाव पर लगी, ब्राह्मणों पर जान की बन आई। इस बौद्ध धर्म के प्रभाव से समाज धर्म और मोक्ष केन्द्रित हो गया था, अर्थ और काम पार्श्व में धकेलते हुए। शूद्रों ने अंग्रेजी की सेना में भर्ती होकर हमारे देशवासियों के खिलाफ ही युद्ध करना शुरू कर दिया। घृणित जातिवादी मानसिकता उभरकर सामने आई। भाई ने भाई को मारा। सभ्यता और संस्कृति चरमराकर विकृत हो गई। यही है हमारे देश की दुखदायी ‘इतिहास-ग्रंथि’।
इस पांडुलिपि की सातवीं कविता ‘प्रजातंत्र’ है, जिसमें कवि भारत के धार्मिक, सामाजिक उठा-पटक के बाद प्रजातंत्र की स्थापना और महत्व को उल्लेखित करते हैं। भारत कभी वैदिक जमाने में आध्यात्मिक शक्ति के शिखर पर था, उत्तर वैदिक काल में धीरे-धीरे यह ग्राफ नीचे आना शुरू हुआ। एक समय ऐसा आया कि इसे विदेशी शक्तियों ने अपना गुलाम बना लिया। देशवासियों ने प्रताड़नाएं ही प्रताड़नाएं झेली, एक के बाद एक, शरीरिक भी, मानसिक भी। जन-मानस में विद्रोह के स्वर फूटे और देश गुलामी की जंजीरों से आजाद हो गया। आजादी के बाद विकराल समस्याएं आई, जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विषमता की। प्रजातंत्र भी डगमगाने लगा। प्रजातंत्र की जड़ों में कई धाराएं बहने लगी। जनता भ्रमित। नेताओं को जनता की मति-गति से क्या लेना-देना? सत्ता लोलुप नेता अपने वोट बैंक बनाने लगे। समाज अलग-अलग समूहों में ध्रुवीकृत होते चला गया। शोषण-चक्र चलता रहा। सच्ची आध्यात्मिकता किनारा करने लगी, मिथ्या कर्मकांड हावी होने लगे। जो लोग मानवता को उच्च शिखर पर ले जाना चाहते थे, वे दरकिनार कर दिए गए। जनता कूप मंडूकवत बनी रही। आज भी जनता का वही हाल है। हिन्दुओं के शूद्र एवं अन्त्यज दूसरे धर्मों की शरण लेने लगे। मुस्लिम और ईसाई धर्म में धर्मांतरण उनका होने लगा। ईसा की करूणा और मुसलमानों की जातिविहीनता लोगों को आकर्षित करने लगी। आज भी भारतीय लोकतंत्र नंगे बदन है। प्रजातंत्र का मूल उद्देश्य था जनता को अपना जीवन जीने की आजादी के अवसर प्रदान करना। क्या चेतना के विकास के बिना यह संभव है? कदापि नहीं। अपरिपक्व अवस्था में है हमारा लोकतंत्र। उसे सुदृढ करने के लिए अतिमानस चेतना के स्तर को पाना ‘अपरिहार्य’है।
अथर्वा की पन्द्रहवीं पांडुलिपि ‘आनंद वल्ली’ है। क्या कवि ने अपने नाम पर इस पांडुलिपि की रचना की? या फिर आनंद कोई और पात्र था? कवि ने इस संदर्भ में एक कथा भी बुन ली कि ‘सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र’ को आधार बनाकर, जिसके अनुसार बुद्ध के पूर्व जन्मों में देवदत्त ने उन्हें बुद्धत्व का ज्ञान दिया था। कालांतर में आनंद और देवदत्त बुद्ध के शिष्य बने। देवदत्त के द्वेषभाव की वजह से बौद्ध-धर्म आगे जाकर कई भागों में बंट गया, जबकि आनंद ने तथागत के पद-चिह्नों पर चलकर बुद्धत्व की खोज को धर्म का मुख्य आधार बनाया। आनंद कभी बुद्ध के प्रिय शिष्य हुआ करते थे और इस जन्म में कवि आनंद बनकर उभरे। कथा-सूत्र में शाक पल्ली, गाजीपुर, बलिया का उल्लेख इस बात की पुष्टि करता है। अतः अथर्वा का आनंद एक ही है, जो कभी पूर्व जन्म में आनंद नामक परम बौद्ध-शिष्य हुआ करता था। पूर्व जन्म की सारी स्मृतियों को इस जन्म की साधना के माध्यम से लिपिबद्ध कर सोलह पांडुलिपियों के वृहद्ग्रंथ के रूप में अथर्वा से हमारी पीढ़ी को सही मार्गदर्शन हेतु उपलब्ध करवाया है। मनुष्य साधना क्यों करता है? अमूर्त आनंद की प्राप्ति के लिए ? कवि आनंद यज्ञ की तरह इस काव्य का शुभारंभ स्वस्ति वाचनम् के ईश्वरोपासना मंत्र ‘ओ हिरण्यगर्भ समवर्तताग्रे.....’ से करते है और समापन शांति पाठ से करते है। इस पांडुलिपि की पहली कविता ‘विश्व कवि’ है अर्थात् वे कवि जिनकी कविताओं में आत्म-ज्योति की चमक होती है, अंतरात्मा की आवाज होती है और विश्व कल्याण की भावना होती है। आधुनिक कवियों में ये लक्षण कहाँ?
कहाँ से कविता शुरू होती है और कहाँ पर खत्म, ये भी उन्हें पता नहीं चलता है। एक छोटा-सा विचार उनकी कविताओं के रचना का आधार बनता है, वह भी स्व-केंद्रित, अपने मन के इर्द-गिर्द घूमने वाला। सामूहिक उत्थान की भावना का तो नामो-निशान नहीं होता है। आज के कवियों में साधना के प्रति न तो आस्था है, न रूझान है, न समय है और न मेधा है। आत्म-ज्योति तक पहुँचना कोई साधारण कार्य नहीं है, गुमनाम जीवन जीना पड़ता है, सब-कुछ त्यागकर। टी.एस. इलियट कहते है, सर्जक को सृजन-प्रक्रिया के तत्वों के रूप में भाग नहीं लेना है, बल्कि उस क्रिया को आगे-पीछे करने के लिए उत्प्रेरक (catalyst) बनना ही कवि का काम और उसकी मर्यादा है। उत्प्रेरक रसायन विज्ञान का शब्द है, जिस पदार्थ की उपस्थिति से उसकी अपनी अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आता है, मगर रसायनिक क्रिया की गति को या तो त्वरित कर देता है या पीछे कर देता है। उदाहरण के तौर पर प्लैटिनम का तार ऑक्सीडेशन-प्रक्रिया में वृद्धि करता है, मगर उसकी अपनी संरचना में कोई परिवर्तन नहीं आता है। ‘मैं यह क्रिया कर रहा हूँ’ - यह भाव उत्प्रेरक में नहीं रहता है, उसी तरह मैं यह कविता लिख रहा हूँ, कवि के मन में यह भाव नहीं आना चाहिए, तभी जाकर उसका कवि होना सार्थक है। जिस तरह किसी पेड़ के पत्ते अपने आप झड़ने लगते हैं, हथेलियों की अंगुलियों पर नाखून, सिर पर बाल काटने के बाद भी अपने आप बढ़ने लगते हैं। उसके लिए जबरदस्ती कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है। वडर्स वर्थ कहते है, अपने आप भीतर से भावनाओं का प्रवाह अचानक अनायास फूटने लगता है, वही प्रवाह तो कविता है। इस पांडुलिपि की दूसरी कविता ‘स्वगत’ है, जिसमें महाकवि आनंद अपनी सर्जन-धर्मिता के बारे में उद्गार व्यक्त करते हैं। एकांत में शब्दों को इंतजार, दिन-दिन भर, रात-रात भर, शब्द अपना अर्थ बताने को तैयार नहीं - उस अवस्था में आत्म-शोध से अतिमानस की चेतना पाकर दूसरे कवियों के अंतर्मन की टोह लेना, उनके शब्दों को भेदना, अदृश्य जगत में उनकी आत्माओं से वार्तालाप करना क्या कोई सहज कार्य है? जिसकी कुंडलिनी शक्ति जागृत नहीं हुई हो, क्या वह सृष्टि के उद्भव से लेकर आज तक की दुनिया के कवियों को अपने शब्दों में पिरो सकता है? कितनी भाषाएं बदली होगी, कितने जन्म-जन्मांतर बीते होंगे ? कवि के आत्म-संवाद की नाटकीय शैली अत्यंत प्रभावशाली है।
इस शृंखला की तीसरी कविता ‘प्राचीन योग्य’ है। यह एक ऋषि का नाम है। इस कविता में दीर्घतमा विश्व के सभी पीड़ितों का प्रतीक है। प्रोफेसर गोरास्या आरोहण अवतरण की प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ है, कवि की तरह उन्हें भी विश्वास है कि एक न एक दिन अवश्य ऐसा आएगा, जब ब्रह्मांड में स्थित सारी पृथिवियाँ ब्रह्मलोक से चलकर हमारी पृथिवी पर अवतरण करेंगीं और मानव भी आरोहण करेगा, जिसके फलस्वरूप प्रज्ञा उसमें प्रवेश करेगी और अज्ञानता का अंत होगा। इस प्रक्रिया में मनुष्य की सोई हुई आत्माएं जाग जाएगीं, तब जाकर मनुष्य के दुखों का अंत होगा।
इस पांडुलिपि की अंतिम कविता ‘शांति पाठ’ है। समवेत स्वर में सभी कविगण प्रार्थना करते हैं कि सब के हृदयों में परम विवेक का उदय हो और वह ज्ञान समस्त दिशाओं में फैल जाए। सभी के भीतर आत्म-ज्योति खिलें। हवा शांत हो, धरती का ताप शांत हो, नदियाँ अमृतमयी बने, अंतरिक्ष, पृथिवी, औषधियां शांत हो, चंद्रमा शीतलता देता रहे, शब्दों की गर्मी शांत हो, मंत्र शांत हो, राजनीति, धर्म, वाणिज्य और व्यापार शांत हो, सौंदर्य की आत्मा शांत हो। भारत के प्रजातंत्र की संसद शुद्ध हो, अशांत नेता शांत हो, पूरी सभ्यता संस्कृति और प्रकृति का तालमेल हो, पूरी दुनिया का मंगल हो।
इस ग्रंथ की अंतिम अध्याय ‘षोडषी’ है। इसमें कवि की कोई कविता नहीं है। इस पांडुलिपि की अंतिम पंक्ति “अथर्वाः मैं वही वन हूँ” की अनुगूँज शनिलोक पर विकसित मानवता के पास शेष रह गई थी, इसलिए यह कला पृथिवी पर उपलब्ध नहीं हो गई थी। पूरा विश्व उस पांडुलिपि की ध्वनि को रिकॉर्ड कर दुर्लभ कला के रहस्य को उद्घाटित करने के लिए तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं। वैज्ञानिक भी, आध्यात्मिक भी। कुछ-कुछ तो दावा कर रहे है कि वे इस पराभौतिक विद्या की खोज कर चुके है, मगर प्रस्तुतीकरण का तरीका उनके पास नहीं है। क्या त्रिपुर सुंदरी षोडषी श्री विद्या का रहस्य जानना इतना आसान है? कहानी के सूत्र धार कहते है कि शायद ह्वेनसांग, इब्नबतूता, अलेक्जेंडर और कनिंग्घम की अप्राप्त पुरानी पोथियों को खोजा जाए तो शायद अथर्वा कवि की सोलहवीं पांडुलिपि मिल जाए।
प्रोफेसर आनंद ने अपने अथर्वा महाकाव्य का पटाक्षेप इस रहस्यमयी तरीके से करने का उद्देश्य मुझे समझ में नहीं आया और न ही प्रोफेसर गोरास्या जी ने अपनी पुस्तक में इस बारे में कहीं जिक्र किया। क्या कवि को लगता है कि उसे जितना कहना था, वह कह चुका है? या फिर यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते कवि थक गया है? या अतिमानस ने इसे रहस्यमयी बनाने का आदेश दिया है? या आने वाली पीढ़ी अपना रास्ता खुद तय करें? इन सवालों का सही जवाब तो कवि को छोड़कर और कोई नहीं दे सकता है। इसके अतिरिक्त, कुछ और सवाल मेरे मानस पटल पर अभी तक अनुत्तरित है।
क्या यह षोडशी कला प्रश्नोपनिषद की ‘मधुविद्या’ है, जिसके बारे में आज तक कोई नहीं जानता है? हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘अनामदास का पोथा’ वाली यह ‘मधुविद्या’ है, जिसके कारण विश्व की मूलभूत सामग्री जैसे पानी, पवन, गगन यहाँ तक कि सारे प्राणी मधुर लगते है। क्या यह ‘मधुविद्या’ अरविंद के दर्शन की शाखा तो नही है, जो मनुष्य जीवन में भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन बिठाना सिखाती है? इस विद्या का वर्णन वृहदारण्यक उपनिषद और छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है। इन्द्र ने दधीचि को यह विद्या सिखाई थी, जिसे किसी और को नहीं बताने के लिए कहा गया था। कवि की यह विद्या गुप्त क्यों रह गई या उसे रखा गया ? मुझे लगता है, पन्द्रह पांडुलिपियों की विद्या में पारंगत होने के बाद सीखना कुछ शेष नहीं रह जाता है। मनुष्य उस अवस्था में पहुँचने के बाद कुछ भी अभिव्यक्त नहीं कर सकता है।
शब्दातीत, त्रिगुणातीत, अनभिव्यक्त। केवल आनंद ही आनंद। अतः कवि आनंद अथर्वा के समापन के लिए,भले ही ‘कुछ नहीं’ कहकर रहस्यमयी तरीके से अचानक पर्दा गिराते हैं, मगर बहुत कुछ अकथ्य कथन कह जाते है कि भारत का अतीत अध्यात्म मनुष्यता को चेतना की उस परम स्थिति में ले जाता है, जहाँ केवल आनंद ही आनंद है, मधु ही मधु है, जिसे कोई बता नहीं सकता। उसे पाने के लिए तो अपने आपको साधना के लिए तैयार करना होगा, तभी जाकर आपके व्यक्तित्व में कृष्ण की तरह सोलह कलाओं का विकास होगा। यही ‘षोडशी’ का सही अर्थ है।
जिस तरह कृष्ण भगवान में सोलह कलाएँ थी, उसी तरह अथर्वा की महाकाव्य में सोलह पांडुलिपियाँ है, एक से बढ़कर एक, आत्मोत्थान से परिवार, समाज, राष्ट्र और अंत में विश्व कल्याण हेतु मार्ग प्रशस्त करती हुई। छब्बीस साल में लिखी हुई सोलह पांडुलिपियों से संग्रहित यह पुस्तक वास्तव में सोलह कविता-संग्रहों का समुच्चय है। दूसरे शब्दों में, एक पुस्तक में सोलह पुस्तकें समाई हुई है। ये पुस्तकें स्व-केंद्रित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक चिंतनमुखी हैं। केवल एक देश की समस्याओं का समाधान नहीं करती है, बल्कि समूचे विश्व की समस्याओं का निराकरण हेतु सुझाव देती है। जाति, धर्म, संप्रदायों से परे संपूर्ण मानव समाज को ईश्वर की कृति समझकर सुख, शांति और समृद्धि की राह दिखाती है। कविताओं की भाषा-शैली, उदात्तता और प्रासंगकिता कवि आनंद को केवल कवि का दर्जा नहीं देती है, बल्कि उनकी आत्म-साधना से प्रेरित कविताएं उन्हें महाकवि, ऋषि और ईश्वर-पुत्र की संज्ञा से नवाजती है। अंत में, उनकी कविताएं यह सिद्ध करती हैं कि कविताएँ केवल कला के दृष्टिकोण से ही रची नहीं जाती है, बल्कि जीवन चतुष्टय की पूर्ति हेतु एक सशक्त माध्यम है। प्रोफेसर गोरास्या के शब्दों को मैं समर्थन करता हूँ कि ‘अथर्वा’ केवल क्रांति का आह्वान नहीं करती है, बल्कि महाक्रांति को आमंत्रित करती है, वह भी बंदूक की नोक से नहीं, बल्कि नासाग्र (नाक की नोक) से , व्यक्तिगत ध्यान-धारणा-प्रत्याहार और समाधि से।
प्रोफेसर आनंद द्वारा रचित ‘अथर्वा’ कई सदियों तक मानवता को सही रास्ता दिखाती रहेगी। ऐसे कवि युगों-युगों में कभी-कभी ही पैदा होते हैं। ‘अथर्वा’ कई कवियों को साधक बना देगी, उनके भीतर ऋषि भाव पैदा करेगी और कविता के नए युग का शुभारंभ होगा। इन्हीं शुभ कामनाओं के साथ.......

दिनेश कुमार माली
Blogs By Dinesh Kumar Mali

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